जय श्री कृष्णः.श्री कृष्ण शरणं मम.श्री कृष्ण शरणं मम.चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः। स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत । तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥ जय श्री कृष्णः

गुरुवार, 20 मई 2010

वास्तु शास्त्र और रोग निवारण



वास्तु शास्त्र के नियम बहुत ही सूक्ष्म अध्ययन और अनुभव के आधार पर बने हैं.इसमे पंच मूलभूत तत्त्वो का भी समावेश किया गया हैं. ये पंच मूलभूत तत्त्व हैं – आकाश, पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि, वास्तु मात्र भवन निर्माण नहीं, अपितु वो सम्पूर्ण देश, नगर, उपनगर,निर्माण योजना से लेकर छोटे छोटे भवन और उसमे रखी जाने वाली वस्तुओं तक से सम्बंधित हैं.
जिन घरों में वास्तु दोष होता हैं, उन घरों के सदस्यों को अक्सर बीमारी रहती हैं. वास्तु दोष पंच तत्वों के असंतुलन के कारण होता हैं.जिस तत्व के कारण असंतुलन होता हैं, उससे सम्बंधित रोग उत्पन्न होते हैं.आईए जाने किस दिशा में क्या दोष होने से किस प्रकार के रोगों का सामना करना पढ़ सकता हैं.....

पूर्व-दिशा-के-दोष:-

(१)- यदि पूर्व दिशा का स्थान ऊँचा हो तो ग्रहस्वामी गरीब होगा, अर्थात मेहनत का फल पूर्ण नहीं मिलेगा अपव्यय ज्यादा होगा,तथा उसकी संतान अस्वस्थ, मन्दबुद्धि, पेट और यकृत कि रोगी होगी.

(२)- यदि पूर्व दिशा में रिक्त स्थान ना हो और बरामदे कि ढाल पश्चिम कि और हो तो जातक आँखों कि बीमारी से त्रस्त और लकवे का शिकार भी हो सकता हैं.

(३)- यदि घर के पूर्वी भाग में कूड़ा कचरा , पत्थर और मिटटी के ढेर हो तो संतान हानि होने कि संभावना प्रबल रहती हैं.

(४)- यदि घर के पश्चिम में नीचा, या रिक्त स्थान हो तो ग्रहस्वामी यकृत, गले, गालब्लेडर कि बीमारी से ग्रसित रह सकता हैं.व् मृत्यु सामान कष्ट प्राप्त होते हैं. धन समाप्त हो का ऋण कि संभावना बनी रहती हैं.

(५)- यदि घर के पूर्व कि दीवार पश्चिम से ऊंची हो तो संतान के लिए बाधाकारक व् संतान की विद्या में रूकावट की संभावना रहती हैं.

(६)- यदि घर के पूर्व दिशा में शोचालय हो तो घर कि बहू-बेटियो को बीमारी अथवा मानसिक परेशानी रहती हैं तथा संतान की उन्नति में नाना प्रकार की बाधाएं उत्पन्न होती हैं.

उपाय- 

पूर्व दिशा में पानी की टंकी, टोंटी और कुआँ लगाना शुभ रहता हैं. पूर्व दिशा का प्रतिनिधि ग्रह सूर्य हैं, यह कालपुरुष का मुख हैं, पूर्वी फाटक या गेट पर सूर्य यन्त्र विधिवत विद्वान ब्राह्मण द्वारा प्रतिष्ठा कर स्थापित किया जाएँ, और मंगल तोरण लगाएं. या घर का पूर्वी भाग नीचा और खाली करें. पूर्वी भाग नीचा व् खाली होने से घर के लोग स्वस्थ रहेंगें.धन और वंश की वृद्धि होगी तथा यश और प्रतिष्ठा बढ़ेगी..

         
अगले लेख में पश्चिम दिशा पर चर्चा होगी.....................    

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