जय श्री कृष्णः.श्री कृष्ण शरणं मम.श्री कृष्ण शरणं मम.चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः। स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत । तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥ जय श्री कृष्णः

बुधवार, 26 मई 2010

वास्तु शास्त्र में अंको का महत्त्व





वास्तु शास्त्र में अंको का महत्त्व 





हमारे जीवन में कुछ प्रोपर्टी आने से हमारा जीवन खुशिओं से भर जाता है तथा कोई प्रोपर्टी ऐसी होती है कि उसके आगमन से कष्ट व क्लेश तथा हानि का सामना करना पड़ता है ऐसा क्यों ? आइये वास्तु व अंक विज्ञान के सन्दर्भ में यह खोजते हैं.........



आप कोई मकान,जमीन,फ़्लैट आदि खरीदने क्र बारें में सोचते है,तो सबसे पहले आपके मन में यही प्रश्न उठता है कि फलां अंक का मकान,प्लाट,फ़्लैट मैरे लिए शुभ होगा ? फलां शहर में इसकी खरीददारी करके वहां रहना फलदायक होगा ? वास्तु और अंक ज्योतिष एक ऐसे शास्त्र है जिनमें इस तरह क्र तमाम सवालों और शंका-दुविधाओं का विधिवत और तर्क सम्मत समाधान उपलब्ध है.आपको अंक ज्योतिष ही बताता है कि फलां घर.शहर या प्लाट आपके लिए शुभ और स्मर्धिदायक तरंगे उत्पन्न करता है या नहीं.मन्त्र,अंक और शब्दों के उचारण से ऐसी अलौकिक और प्राणदायक तरंगें उत्पन्न होती है,जो व्यक्ति पर खास प्रभाव डालती है. शब्द को परमात्मा का ही रूप माना गया है. जिससे अंक और शब्द में परस्पर गहरी मित्रता है. जैसे परमात्मा में सभी शास्त्र यानी मनुष्य के मूल शब्द व्याप्त है.वैसे ही अंक भी उन्हीं में समाविष्ट है.



शुन्य, शब्द और अंक कि जड़ है और शुन्य को निर्विकार ब्रह्म माना गया है.इससे ही शब्द और अंक का जन्म हुआ है यानी नौ ९ अंको का जनक शुन्य है.
और शून्य स्वयं आत्मा है.जिससे उत्पन्न हो कर अंक इसमें ही विलीन हो जाते है.शायद यही कारण है कि आपके और हमारे शरीर पर इन अंको का लगातार प्रभाव पडता रहता है.
मजे की बात तो यह हें किये सभी अनल ग्रहों से जुड़े हुए है. कौन सा अंक किस ग्रे से जुड़ा है आइये आप को बताते है...
सूर्य – १ अंक, चंद्रमा – २ अंक, वृहस्पति – ३ अंक, राहू – ४ अंक, बुध – ५ अंक, शुक्र – ६ अंक, केतु – ७ अंक, शनि – ८ अंक, तथा मंगल – ९ अंक.



इस प्रकार सभी नव ग्रह अलग-अलग अंको का प्रतिनिधित्व कर हमारे जीवन को प्रभावित करते रहते है. वास्तु शास्त्र में इन अंको और ग्रहों का बडा ही महत्वपूर्ण स्थान है, इनके ज्ञान के अभाव में वास्तु शास्त्र अधूरा ही रह जाता है.

आपकी जो जन्म तिथि होती है वह अंक आपका मूलांक कहलाता है. इस अंक का अधिपति ग्रह अलौकिक और अदृश्य तरंगों के माध्यम से आपको हमेशा ही प्रभावित करता रहता है. विभिन्न तरगे उत्पन्न तारने के कारण अंक एक दूसरे के मित्र, सम, या शत्रु भी होते है.विभिन्न ग्रहों से जुड़े होने के कारण अंको के विभिन्न शुभ रंग भी होते है.

आपके जन्म अंक कि तरह ही भवन, फ्लेट के नंबर और जगह का नाम भी आप पर अनुकूल-प्रतिकूल प्रभाव डालते है.मकान और जगह का अंक जानने के लिए निम्न सूची को देखिये........



ए १, बी २,सी ३,डी ४,इ ५, एफ ८, जी ३, एच ५, आई १, जे १, के २, एल ३, एम् ४, एन ५, ओं ७ पी ८, क्यु १, आर २, एस ३, टी ४. यू ६, वी ६, डब्लू ६, एक्स  ५, वाई ५ जैड ७.....



यदि आपकी जन्म तारीख १६ है तो आपका जन्म मूलांक १६ यानी १+६=७ होगा
फ्लैट का नंबर अंक यदि १२० है तो फ्लैट का १+२+० = ३ आयगा और नौएडा में खरीदना है तो नौयडा का अंक ५७१४१ =९ बनता है क्रमश: ७ मूलांक का सम्बन्ध ३ और ९ से होना चाहिय . अंक ३ और ९ का मित्र सम्बन्ध यहां नहीं बन रहा है इस लिए फ्लैट नंबर १२० आपके हित में नहीं है दूसरा न० देख सकते हो ...



अंको के मित्र व शत्रु पक्ष को समझने के लिए अलग से एक लेख लिखा जा रहा है जिसके अनुसार आप यह जान सकतें है की कौन समारा मित्र तथा कौन हमारा शत्रु है या होगा...



यदि इसी प्रकार से हम जमीन,मकान भूमि आदि कि खरीद-परोख्त करे तो आशातीत लाभ प्राप्त होगा.कोई प्रोपर्टी से अधिक लाभ होता है किसी संपत्ति से भारी नुक्सान भी उठाना पढता है. यदि इन बातों कि सावधानी रखें तो ईश्वर की कृपा से समृधि व उन्नति होती रहेगी.........


श्रीरस्तु!!




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