जय श्री कृष्णः.श्री कृष्ण शरणं मम.श्री कृष्ण शरणं मम.चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः। स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत । तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥ जय श्री कृष्णः

सोमवार, 24 मई 2010

रसोईघर घर के सुख का महत्त्वपूर्ण द्वार


रसोई  एक ऐसा शब्द हैं जो कि हमारी दिनयर्चा में उत्साह के साथ लिया जाता हैं, और यही रसोई हमारें भाग्य का मुख्य द्वार भी हैं, यह बात शायद किसी को मालूम हो, फिर भी मै आप सब को इस शब्द का रहस्य बताने जा रहा हूँ, कि किस तरह रसोईघर हम सब के लिए भाग्य का द्वार हैं. वास्तु शास्त्र के अनुसार रसोई दक्षिण-पूर्व अर्थात अग्नि कोण में स्थित हो तो घर में सुख का प्रभाव एवं समृधि का विस्तार होता हैं. रसोई अर्थात जंहा पर रस हो प्रेम का, मिलजुल कर सारा परिवार वंहा बैठ कर रसास्वादन करें, कहा भी हैं रस + ओई = रसोई, लेकिन आजकल रसोई का स्थान किचन ने ले लिया हैं. मतलब आप समझ हि गए होंगें कि जंहा पर किच-किच का भाव होगा वह स्थान किचन कहलायेगा.शब्द का सही उचारण करें रसोई, पाकशाला, भोजनालय आदि. इससे भाव भी शुद्ध होगा, तथा भोजन भी रुचिकर लगेगा. हमारें शास्त्रों एवं महापुरुषों ने युगों पूर्व समाज को निर्देश दिए थे कि परिवार के सभी सदस्यों को भोजन रसोई में ही एकत्रित होकर खाना चाहिये. ऐसा करने से आपस में प्रेम भाव बढ़ता हैं सभी अनुशासन में रह कर माता-पिता के आज्ञाकारी होते हैं, जिस के फलस्वरूप सभी प्रसन्न रहते हैं. और ऐसा ही  हुआ, पिछले कुछ वर्षों से जब से होटल तथा किचन संस्कृति ने प्रभाव दिखाया.  बस........... तभी से परिवार में बिखराव की स्थिति बननी शुरू हुई जो आज तक संभल नहीं पाई. शास्त्रों व् महापुरुषों की बात का क्या रहस्य था. आइये जानें ज्योतिष एवं वास्तु के नियमों द्वारा ......

आज हमारें समाज की सबसें बढ़ी समस्या हैं घर में बरकत का ना होना, जितना कमाते हैं वह कम होता हैं परिवार में शान्ति नहीं हैं. घर में क्लेश या कर्ज का बोझ हैं, बिमारी में सारा धन तथा कोर्ट कचहरी में खर्च हो जाता हैं इत्यादि इत्यादि अनेक समस्याओं ने पीड़ीत करा हुआ हैं, और हम सब इधर-उधर भाग रहे हैं ना जाने क्या क्या उपायों में अपना धन व् समय नष्ट कर रहे हैं.इन सबके बाबजूद शान्ति नहीं मिलती हैं.हम जीने की कला को जितना भूलते जा रहे हैं. उतने ही कष्टों की ओर बढ़ रहें हैं.
इन सब का कारण एक हैं वो यह कि हम आधुनिकता के पीछे भाग कर अपनी मर्यादाओं को भुला बैठे, की हम क्या थे और क्या बनने जा रहे हैं, जेसै मैंनें बताया कि हम सब रसोई का सही उपयोग करना भूल गए या जानबूझ कर भुला बैठें,

जरा विचार करें कि रसोई ही क्यों ? क्योंकि रसोई अग्नि कोण में स्थित होनी चाहिए , अग्नि स्थान में सब पकता हैं रसोई में सभी ग्रहों का वास माना गया हैं.रसोईघर में रखी जाने वाली सभी सामग्री. अनाज. मिर्च,मसाले आदि ज्योतिष के अनुसार किसी न किसी ग्रह का प्रतिनिधित्व करते हैं, उदाहरण के रूप में गेहूं सूर्य का, चावल चंद्रमा का, मूंग बुध के, चने कि दाल वृह्स्पती की,आदि सभी वस्तुएँ किसी न किसी रूप में सभी ग्रहों का हिस्सा हैं, जब मिलकर खाना खाते हैं तो खाना पकाने वाली मां जो कि चन्द्र का रूप हैं, पत्नी शुक्र का रूप हैं, बहन बुध के रूप में जब खाना परोसेगी तो आप समझों कि चन्द्र शान्ति देता हैं, शुक्र वैभव् प्रदान करता हैं, बुध बुधि एवं व्यापार में सफलता देता हैं, इन तीनों के गुण आपको मिल गए, परिवार के सदस्य  एकत्रित होने से एवं रसोईघर में बैठ कर भोजन करने से जो सभी ग्रहों का स्थान हैं सभी ग्रह प्रसन्न होंगें,दूसरा कोई उपाय करने कि आवश्यकता नहीं होगी.ज्योतिष की लाल किताब के अनुसार भी रसोई में बैठ कर खाना खाने से मंगल व् राहू ग्रह का दोष समाप्त होता हैं.वह शुभ फल देते हैं
शास्त्रों में कहा गया हैं कि घर वर्ष भर का गेंहू रखने से राहू का प्रकोप नहीं होता हैं.बीमारियाँ नहीं आती हैं. जूतें-चप्पल राहू का रूप होते हैं इसे रसोईघर से दूर रखा जाता था, लेकिन आज हम कहाँ हैं जूतें-चप्पल पहन कर खाना बनाते और खाते हैं. सबके घरों में चोखट दरवाजों के लिए होती हैं विडंबना हैं कि नए युग में नाम तो चोखट हैं लेकिन तीन ही खूंट हैं चोथा गायब हैं, भारतीय ज्योतिष के अनुसार माता का प्रत्येक कुण्डली में चोथा ४ स्थान हैं जो की सुख का भाव हैं संपत्ति का भाव हैं, वाहन का भाव हैं यदि हम माता का आदर करे अर्थात आशीर्वाद प्राप्त करे तो हमें उपरोक्त वस्तुएँ स्वतः प्राप्त होंगी, पिता का नवम एवं दशम भाव से सम्बन्ध होता हैं जी की भाग्य का भाव तथा रोजगार का भाव और राज्य लाभ का भाव हैं यदि हम पिता का आशीर्वाद प्राप्त करें तो यह सब कुछ अपने आप मिल जायगा, शास्त्र भी कहते हैं की माता-पिता की सेवा करों तो जीवन में किसी भी प्रकार का अभाव नहीं होगा. अतिथि देवो भव, अतिथि का कुण्डली में ग्यारहवां भाव होता हैं जो कि लाभ का स्थान हैं इस लिए अतिथियों का आदर-सत्कार करने से लाभ होगा, इन सबका स्रोत्र केवल एक रसोई ही हैं रसोईघर कि मर्यादा में चलेंगे तो जीवन के सभी सुख प्राप्त होंगे.....

यंहा रक बात ध्यान रखें कि भोजन जितना दूर रसोईघर से ले जाया जायगा घर कि बरकत उतनी समाप्त होती जायगी, बेडरूम में कभी भी भोजन नहीं करना चाहिए, रसोई में स्थान न हो तो रसोई के साथ बैठ कर भोजन करने से घर-परिवार में खुशहाली आती हैं......................

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही बेहतरीन बात आपने बताई है...

    हमारे अध्यात्म द्वारा कही गयी बाते बिल्कुल ही सटीक होती हैं...

    परन्तु अंग्रेजी भाषा कि आलोचना करना ठीक नहीं लगा...
    'किचन' शब्द को आप एसे भी देख सकते है, जहां किच(न) हो अर्थात किच-किच न हो...
    वास्तु पर बेहद ही ज्ञानवर्धक बातों के लिए धन्यवाद...

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