जय श्री कृष्णः.श्री कृष्ण शरणं मम.श्री कृष्ण शरणं मम.चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः। स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत । तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥ जय श्री कृष्णः

शुक्रवार, 4 जून 2010

वास्तु के द्वारा सास बहू के रिश्ते संवारें........


अकसर परिवारों में सास-बहू, भाई-बहन, भाभी, माता-पिता के टकरावों के बारें में हम सुनते है. किसी परिचित परिवार में यदि ऐसा अलगाव दिखता है तो मन में बहुत दुःख होता है.किसी का वश नहीं चलता हम अपने ही सामने अपने मित्र या सम्बन्धी व रिश्तेदार का परिवार जो कुछ समय पहले शांत तथा मिलजुल के रहने वाला था किन्तु आज पल भर में ही बिखर गया.इसमें किस की गलती है या किस की नहीं यह तो सोचने से बाहर की बात हो गयी चाहे कुछ हो एक घर जो बड़ी मुश्किलों से बनता है आज उसे हम बिखरता हुआ देख रहे है.क्या कारण है कि पल भर में ही ऐसा हो रहा है. इसका उत्तर केवल वास्तु शास्त्र में ही वर्णित है यदि हम इस वास्तु के नियम अनुसार चलते है तो यह स्थिति पुनः नहीं दिखाई देगी. और सास-बहू के रिश्तों को मधुर बनाया जा सकता है. जन्मकुंडली के मिलान के समय हम केवल युवक एवं युवती की राशि,नक्षत्र व गण भकूट और नाडी का ही मिलान करते है किन्तु परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मिलान की व्यवस्था हमारे पास उपलब्ध नही है. इसी कारण से हम विपरीत परिणाम देखते है.
वास्तु शास्त्र के नियम अनुसार घर / भवन में पारिवारिक सदस्यों को कहां कहां रहना व सोना चाहिए जिससे उनके आपस में सम्बन्ध मधुर हो. वास्तु शास्त्र के नियम अनुसार परिवार का मुखिया दक्षिण-पश्चिम कोण में सोना चाहिए.इस कोण में होने से आत्म विशवास बड़ता है. तथा वह निर्णय लेने में समर्थ होता है दक्षिण में सिर करके होने से व्यक्ति में नेतृत्व कि क्षमता बडती है.यदि दक्षिण में सिर करने की सुविधा न हो तो पूर्व दिशा में सिर करके तथा पश्चिम में पैर करके भी शयन किया जा सकता है. परिवार का जो भी सदस्य यदि दक्षिण-पश्चिम में निवास करता है तो वह घर में प्रभावशाली हो जाता है अत: स्पष्ट है कि घर के मुखिया उसकी स्त्री को घर के दक्षिण-पश्चिम में निवास करना चाहिये. तथा कनिष्ठ स्त्री-पुरुष, देवरानिया या बहू को शयन नहीं करना चाहिये.
जो स्त्रियां घर के वायव्य उत्तर-पश्चिम कोण में शयन / निवास करती है उनके मन में उच्चाटन का भाव आने लगता है वह अपने अलग से घर बसाने के सपने  देखने लगती है. इस लिए इस कोण में अविवाहित कन्याओं को निवास करना शुभ होता है जिससे उनका विवाह शीघ्र हो.
वायव्य कोण में नई दुल्हन को तो बिलकुल मत रखे इससे उसका परिवार के साथ अलगाव रहेगा.
वास्तु शास्त्र के नियम अनुसार दक्षिण-पश्चिम कोण दिशा घर की सबसे शक्तिशाली होती है इसमें सास को सोना चाहिए अगर सास ना हो तो घर की बड़ी बहू को सोना चाहिए उससे छोटी को पश्चिम दिशा में रहना चाहिए उससे भी छोटी तीसरे नम्बर की बहु को पूर्व दिशा में शयन करना चाहिए यदि और भी चोटों बहू हो तो उसे ईशान कोण में निवास रखना चाहिए.
दक्षिण में सोने वाली स्त्री को अपने पति के बायीं और शयन करना चाहिए अग्नि कोण में सोने वाली स्त्री को अपने पति के दायी और शयन करना चाहिए
ग्रहस्थ सांसारिक मामलों में पत्नी को हमेशा पति के बायीं और ही शयन करना चाहिए .
परिवार की मुखिया सास या बड़ी बहू को कभी भी ईशान कोण में नहीं सोना चाहिए इससे परिवार में प्रभाव कम हो कर हास्यास्पद स्थिति रहती है वृद्धावस्था में अग्नि कोण में रह सकती है
हमेशा इस बात का ध्यान रखे कि उत्तराभिमुख घर में उत्तर दिशा से ईशान कोण तक, पूर्वाभिमुख घर में पूर्व दिशा मध्य से अग्नि कोण पर्यन्त, दक्षिणाभिमुख मकान में दक्षिण दिशा मध्य से दक्षिण-पश्चिम कोण तक तथा पश्चिममुख मकानों में पश्चिम दिशा से वायव्य कोण तक यदि बाह्य द्वार न रखा जाय तो घर की सभी स्त्रियां आपस में समन्वय व प्रेम की और अग्रसर हो कर सुख की अनुभूति करती है तथा परिवार में सुख समृधी बडती है.
यही कारण हें कि आज के युग में यदि हम प्रक्टिकल वास्तु अपनाते है तो जीवन में किसी भी प्रकार के कष्ट से बिना यंत्र-मन्त्र-तंत्र से छुटकारा पा कर उन्नति के मार्ग में चल सकते है.

शुभमस्तु !!  

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