जय श्री कृष्णः.श्री कृष्ण शरणं मम.श्री कृष्ण शरणं मम.चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः। स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत । तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥ जय श्री कृष्णः

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

वायव्य कोण में किरायेदार होने से लाभ ही लाभ है..

एक मकान बनाने में जीवन की आधी या कभी पूरी कमाई खर्च हो जाती है.मकान बनाना ही काफी नहीं होता, बल्कि उसके रख रखाव पर भी प्रति वर्ष हजारों रूपये की अतिरिक्त आवश्यकता पड़ती है.ऐसे में मकान मालिक, फेक्ट्री मालिक या दूकान मालिक सोचते है कि यदि मकान का कुछ हिस्सा किराए पर दे दिया जाये, तो अतिरिक्त आय का साधन हो जाने से कुछ राहत मिल जायेगी. आधुनिक मानव की तीन मूलभूत आवश्यकताएं है रोटी, कपड़ा और मकान, पेट में खाने को रोटी, तन ढकने के लिए कपड़ा मिलने के बाद स्वाभाविक रूप से सिर ढकने के लिए और जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए मकान की इच्छा उत्पन्न होनी स्वभाविक है. आजकल बड़े बड़े बिल्डर्स तो यही सोच कर मकान या फ्लैट तैयार करते है. परन्तु आम आदमी और बिल्डर्स में बहुत अंतर होता है.बिल्डर्स किरायेदारों को फंसाने के लिए कई हथकण्डो का इस्तेमाल करता है जबकि सीधा सादा आदमी किरायेदार से उलझ नहीं सकता.

वह आए दिन की झंझटबाजी से बचना चाहता है.कई मामले प्रकाश में आए है कि किरायेदार बन कर आए लोग मकान पर ही कब्ज़ा कर बैठे.कई बार तो मुकद्दमेबाजी में ही पूरी जिंदगी बीत जाती है. ऐसे ही उदाहरणों के चलते लोग किरायेदार रखने में कतराने लगे है. परन्तु आज सुरसा की तरह बढ़ती मंहगाई मकान मालिकों के मकान कराए पर देने के लिए बाध्य कर रही है.किराए पर दे लेकिन यदि आप वास्तु के नियमों का भी ध्यान रखेंगें तो सभी समस्याओं से बचा जा सकता है. और मकान मालिक और किरायेदार के बीच सम्बन्ध भी खुशगवार रहेंगे.

पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण मुख्य दिशाए है इनके दांये और बांये भाग ठीक दिशा के ४५ अंश पर उपदिशा बनाते है. इनका नाम जो इसी उपकोण पर आधारित होते है. ईशान, नैऋत्य, वायव्य और आग्नेय दांये व बांये है. इस तरह कुल दिशा उपदिशा आठ होती है. भूमि के मध्य भाग का स्वामी अनन्त देवता होता है. और उधर्व दिशा पर समान स्वामित्व प्राक्रतिक उर्जा, देव, कुल देवता और पितर देवता का होता है. पुराने लोग आँगन के होने पर भी छतों में एक छोटा छेद (धमाला) छोड़ा करते थे, इस्ले पीछे सोच यही थी कि आंधी तूफ़ान बारिश या ग्रहण काल में उन पर आने वाली विपत्ति उस अप्रत्यक्ष शक्ति आशीर्वाद से टल जायेगी. ऐसा होता भी था.

सम्पूर्ण भूखण्ड या प्लाट के सोलह भाग करके चार चार भागो में बाटा जाता है. जिससे प्रत्येक कोण का सही ज्ञान स्मरण रहें. हर कोण के अधिकारी देवता का चिंतन या पूजन भावनात्मक तरीके से किया जाता है. आज भी पूजा के बाद धूपबत्ती या अगरबती घर में चारों ओर घुमायीं जाती है.यह भावनात्मक कष्टों को हरती है

किरायेदार के लिए कमरा या लघु घर अथवा दो तीन कमरों का सेट नैऋत्य कोण में नहीं बनाना चाहिए. इस कोण में किरायेदार रखने से सदैव तू तू मै मै होती रहेगी.क्योकि यह शैतानी ताकतों के अधिकार का क्षैत्र है.यहां पर प्राक्रतिक करिश्में या हादसे भी ज्यादा होते है. आपसी रहन सहन का वातावरण मिलनसार नहीं होगा.

किराए के लिए उत्तर या पूर्व के प्रभाग सदा द्वंद्व रहित पाए जाते है. इनमे ही बनाना बेहतर होता है परन्तु यह गृहस्वामी के लिए अत्यधिक शुभ रहता है. ऐसे में मकान मंजिल बनाने पर गृहस्वामी का भूतल का अधिकार कमजोर पड़ता है. एक खास बात पूर्व आचार्यो द्वारा स्पष्ट की गयी है कि पूर्व या उत्तर में किरायेदार रखना उसके कब्जे की संभावना बड़ाता है. इसलिए किरायेदार को नीचे की मंजिल पर आवास ना दे सुन्दर होगा यदि वायव्य भाग मकान का किराए पर दे दिया जाये इस दिशा कि ऐसी महत्ता है कि इस दिशा में किरायेदार लंबे समय तक नहीं टिक पायेगा. स्वत: ही चला जायगा. और धन भी नहीं मारा जायगा.व्यवहार प्रेममय रहेगा. मालिक की आय बराबर चलती रहेगी. एक बार अवश्य ध्यान रखे कि यदि प्रष्ठभूमि का क्षेत्रफल समान नहीं है तो उसे सम कर दे. यदि संभव नहीं है तो इस विषमता को पृथक कर एक अलग किराए के लिए घर बनाए.प्राय: यह विषमता दूकान और दफ्तरों को अधिक लाभप्रद रहती है.गोदाम भी बना सकते है.परन्तु वह महीने महीने भर बंद नहीं रहना चाहिए.इससे भूखण्ड दोष पैदा हो जाता है. घर की दीवारों को ऊंचा तथा अपेक्षाकृत मोटा रखे.

एक खास बात ध्यान रखे कि छत और फर्श इसी प्रभाकीय कोण पर आती हो तो बेशक नीची रख सकते है. वहां पर कोई समझोता वास्तु शास्त्र नहीं करता है.

किरायेदार अपने घर में मकान मालिक के रंग रोगन से औसत में गहरा रंग रोगन का प्रयोग करे. इससे मानसिक दासता या अल्पता नहीं आने पाती. इससे किरायेदार अपने निजी मकान में जाने का रास्ता आसान करता है..




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