जय श्री कृष्णः.श्री कृष्ण शरणं मम.श्री कृष्ण शरणं मम.चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः। स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत । तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥ जय श्री कृष्णः

शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

जो शान से परे है, वही परेशान (परे+शान) है.



शरीर और मन का आपस में गहरा सम्बन्ध है. स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का वास होता है. यह एक चिंतन है. स्वस्थ मन शारीरिक स्वास्थ का कारण है.यह भी एक धारणा है. इन दोनों के योग से निष्पत्ति यह आती है कि शरीर और मन की स्वस्थता एक दूसरे को प्रभावित करती है. शरीर की जांच में रोग का कोई लक्षण न होने पर भी मन की परेशानी व्यक्ति को अस्वस्थ बना देती है. इसी प्रकार सब प्रकार की निश्चिन्तता और अनुकूलता की स्थिति में भी शरीर के किसी अंग में अचानक किसी रोग का उभार मनुष्य के मन को बेचैन बना देता है.

महात्मा चाणक्य कुशल कूटनीतिज्ञ थे. उनके चिंतन का मुख्य क्षेत्र राजनीति था. पर उन्होंने दर्शन और व्यवहार जगत को भी अपने विचार देते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य का मन ही उसे बांधता है और वही उसे मुक्त करता है इस मान्यता को स्वीकार किया जाए तो मनुष्य के विकास और ह्रास का सारा दायित्व मन पर आ जाता है. एसी स्थिति में स्वास्थ्य और अस्वास्थ्य की जिम्मेदारी से भी वह मुक्त नहीं हो पाता है.

जैन दर्शन के अनुसार शरीर में पांच इन्द्रियों का स्थान है. वैसे ही मन का भी स्थान है. इनमें अन्तर है तो इतना ही कि, मन संचालक है और इन्द्रियां उसके द्वारा संचालित है. बिना पंख यह मन दूर दूर की उड़ान भर लेता है. जहां तक देखता है, संभवतः दूरबीन यंत्र भी नहीं देख सकता. इसके पास गति करने के लिए पैर नहीं है. फिर भी मन दिन रात भटकता रहता है. इसके चंचल स्वभाव को देखते हुए इस पर नियंत्रण रखना उचित है. मन के बारे में एक नई धारणा यह भी बनी है कि चंचलता मन का स्वभाव नहीं है. इसको चंचल बनाने वाली है, मनुष्य की वृतियां. दर्पण में जो प्रतिविम्ब आते है, वे दर्पण के अपने नहीं होते, उसके सामने अच्छी या बुरी जैसी छवि आती है, उसमें प्रतिविम्ब हो जाती है.

दूसरी दृष्टि से देखा जाए तो यह मनुष्य की सोच या अभी व्यक्ति का अन्तर है. भ्रमणशील नहीं है. वह मन को क्या हुआ? उसकी चंचलता सर्व प्रसिद्द है. उसे स्थिर करने का जितना प्रयास किया जाता है. उसकी भाग दौड़ बढ़ जाती है. इसे साधने की तकनीक ही विलक्षण है. कुछ ही व्यक्ति इस पर अनुशासन रख पाते है. अधिकाँश व्यक्ति तो मन के गुलाम होते है. जब तक व्यक्ति मन की गुलामी से मुक्त नहीं होगा, वह उसे स्वस्थ नहीं बना सकेगा.....




यही कारण है कि यदि मन को जीत लिया तो सारा जगत जीत लिया. तथा मन को जितने से कोई रोग भी प्रहार नहीं करता है. मन को जीतने से समस्त जगत वशीभूत होता है.

मन को जीतने से व्यक्ति कभी परेशान नहीं होता है. क्योंकि मन ही मनुष्य की शान है, जब तक मनुष्य के पास शान है तब तक मनुष्य परेशान नहीं हो सकता, मुझे बचपन में किसी महापुरुष ने जो बताया था, वही आज मे पुनः आपके सामने रख रहा हूँ कि ...................जो शान से परे है, वही परेशान (परे+शान) है..............

शुभमस्तु !!








2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर पोस्ट .बधाई !

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  2. पंडित जी नमस्कार /मेरा नाम मणि शर्मा है . मेरी डेट ऑफ़ बिरथ १८ मार्च १९८६ शाम के ७:१५ का है. मेरा सवाल यह है की मेरी शादी १७ जुलाई २०११ मैं हुई थी .लेकिन मेरे पास अभी कोई बचा नहीं है. मेरे पत्ती की डेट ऑफ़ बिरथ है ५ जुलाई १९७९ .क्या आप मेरी समस्या का समाधान कर देंगे तूँ मैं आपकी बहुत आभारी होंगी . मैंने काफी समय से दवाई भी खाई है ओर जो भी कोई किसी मान्यता कर लिए कहता वोह भी किया है लेकिन कुछ भी फायदा नहीं हुआ.

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