जय श्री कृष्णः.श्री कृष्ण शरणं मम.श्री कृष्ण शरणं मम.चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः। स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत । तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥ जय श्री कृष्णः

सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

करवा चौथ में थाली का महत्व..



सौभाग्य देने वाला यह व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष की चंद्रोदय व्यापिनी चौथ को किया जाता है. इसे करक, करवा, करुआ अनेक नामों से जाना जाता है. सुहागिने रात को भगवान शिव, चंद्रमा और स्वामी कार्तिक की पूजा कर सुहाग सामग्री चड़ाती है. सुहागिनों के लिए चंद्रमा को अर्घ्य देने पर व्रत पूरा होता है. मगर अविवाहित कन्याएं तारे का दर्शन कर ले तो भी उनका व्रत पूरा हो जाता है. इसके बाद बयाना अर्थात संकल्प किया जाता है.


करवा चौथ पर थाली की खूबसूरती का भी इस पर्व पर खास महत्व होता है. अपने जीवन में करवा चौथ का इन्तजार प्रत्येक महिला को होता है. इस दिन सोलह श्रृंगार किया जाता है.यदि इस श्रृंगार के साथ साथ आपके हाथ की थाली भी बहुत अच्छी तरह से सजी हो तो आपकी खूबसूरती में चार चाँद लग जाते है. और यह बात शास्त्र संगत भी है. कि जितनी खूबसूरत थाली होगी, उतना ही खूबसूरत भाग्य होगा, यदि अविवाहित कन्याए अपनी पूजा की सामग्री को सजा कर रखेंगी उतना ही खूबसूरत उन्हें पति प्राप्त होता है.


थाली को चार चाँद लगाने के लिए ईयर बड को तेल में डुबो कर थाली पर स्वास्तिक बनाए. इस पर चुटकी से सिंदूर, हल्दी या रंगोली कलर डाल कर थाली को अच्छी तरह से हिलाएं.ताकि स्वास्तिक पर ये रंग चड जाए.बचे हुए रंग को झाड़ कर निकाल दें. आपकी थाली सबसे आकर्षक और खूबसूरत दिखेगी. पूजा की थाली में चन्दन, शहद, अगरबत्ती,फूल, कच्चा दूध,शक्कर, घी, दही, मिठाई, गंगा जल, कुंकुम, चावल, सिन्दूर, मेहंदी,महावर,आदि सामान अपनी परम्परा अनुसार स्थापित करे और साथ में पानी का लोटा भी बाहर से अच्छी तरह से सजा कर रखे तो थाली की शोभा देख कर सभी चकित रह जायेंगे और इसका लाभ यह होगा कि वर्ष भर अर्थात अगले करवा चौथ तक आपका भाग्य भी खूबसूरत होगा.


उत्तरी भारत पंजाब आदि में थाली बदलने का रिवाज है. पंजाबी परिवारों में करवा चौथ का व्रत करने का तरीका थोड़ा सा अलग है. महिलाए सुबह के समय ससुराल पक्ष द्वारा भेजी गयी सरगी से व्रत की शुरुआत करती है. दिन भर निर्जला व्रत रखा जाता है. शाम के समय कथा सुनी जाती है. गोल सर्किल में बैठी सुहागिनें कथा के बीच में थाली घुमाती है और गाती है..........

वीरा कुड़िये करवडा,

सर्व सुहागन करवडा,

कत्ती ना अटेरी ना,

घुम्म चरखड़ा फेरी ना,

सुई च धागा पाई ना,

गवांड पैर पांयी ना,

रूठरा मनाई ना,

सूतड़ा जगाई ना,

बहन प्यारी वीरां,

चन चड़े ते पानी पीना,

ले वीरा कुड़िये करवडा,

ले सर्व सुहागन करवडा,

इस गीत को इसी प्रकार से सात बार गाया जाता है तथा थाली घुमाई जाती है. सांतवी बार जब थाली घुमाई जाती है तो गीत कुछ इस प्रकार से गाया जाता है.

वीरा कुड़िये करवडा,

सर्व सुहागन करवडा,

कत्त ले अटेर ले,

घुम्म चरखड़ा फेर ले,

सुई च धागा पा ले,

गवांड पैर पा ले,

रूठरा मनाई ले,

सूतड़ा जगा ले,

बहन प्यारी वीरां,

चन चड़े ते पानी पीना,

ले वीरा कुड़िये करवडा,

इसके बाद चंद्रमा को अर्घ्य देते समय यह बोला जाता है.....

सीर धड़ी,

पैर कड़ी,

अर्क देन्दी,

सर्व सुहागन,

चौबारे खड़ी,........

इस प्रकार से व्रत का पूरा विधान के सौभाग्य के प्रति सुहागिन महिला अपनी श्रद्धा व् आस्था प्रकट करती है.....

शुभमस्तु !!





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