जय श्री कृष्णः.श्री कृष्ण शरणं मम.श्री कृष्ण शरणं मम.चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः। स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत । तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥ जय श्री कृष्णः

रविवार, 18 सितंबर 2011

आयुर्वेद के चमत्कार.....





आज सभ्यता की घुड़दौड़-आपाधापी ने मनुष्य को स्वास्थ्य के विषय में इस सीमा तक परावलम्बी बना दिया है कि वह प्राकृतिक जीवन क्रम ही भुला बैठा है । फलतः आए दिन रोग शोकों के विग्रह खड़े होते रहते हैं व छोटी-छोटी व्याधियों के नाम पर अनाप-शनाप धन नष्ट होता रहता है । मनुष्य अंदर से खोखला होता चला जा रहा है । जीवनी शक्ति का चारों ओर अभाव नजर आता है । मौसम में आए दिन होते रहने वाले परिवर्तन उसे व्साधिग्रस्त कर देते हैं, जबकि यही मनुष्य 25 वर्ष पूर्व तक इन्हीं का सामना भलीभाँति कर लेता था । आज शताधिकों की संख्या उंगलियों पर गिनने योग्य है । जबकि हमारे पूर्वज कई वर्षों तक जीवित रहते थे, उनके पराक्रमों की गाथाएँ सुनकर हम आश्चर्यचकित रह जाते हैं ।


आहार-विहार में समाविष्ट कृत्रिमता ने जिस प्रकार जिस सीमा तक शरीर के अंग अवयवों को अपंग-असमर्थ बनाया, उसी प्रकार चिकित्सा क्रम भी बनते चले गए । पूर्वकाल में आर्युवेद ही स्वास्थ्य संरक्षण का एकमात्र माध्यम था । धीरे-धीरे वृहत्तर भारत में समाविष्ट अन्य संस्कृतियों के साथ यहाँ अन्य पैथियाँ भी आयीं और आज चिकित्सा के नाम पर ढेरों पद्धतियाँ प्रयुक्त होती हैं । मनुष्य बुद्धिमान हुआ है, निदान के ढंग सोच लिए गए हैं, जीवाणु-विषाणुओं के देखने पहचानने के यंत्र बना लिए गए हैं, परन्तु औषधियों की मारक क्षमता व उन पर अवलम्बन के दुष्परिणामों ने एक बार फिर यह सोचने पर विवश कर दिया है कि क्या यही मनुष्य की नियति है?

इसे दुर्योग ही कहें कि आयुर्वेद जैसी विशुद्ध चिकित्सा प्रणाली पर भी गत दशाब्दियों में वज्रपात ही हुआ है । इसे भी आधुनिक बनाने की ललक में आतुर गिने चुने विद्वानों ने इसकी उपयोगिता और भी कम कर दी है । आज जहाँ आर्युवेद के योगों पर से लोगों का विश्वास घटता चला जा रहा है, वहाँ तुरन्त ठीक होने की आवेशपूर्ण जल्दबाजी ने उन्हें एलोपैथी की मारक औषधियों का गुलाम बना दिया है ।


होम्योपैथी, कोमोपैथी, यूनानी, तिब्बी-सिद्धि, योग चिकित्सा, सूर्य चिकित्सा, कल्क चिकित्सा, टेलीथेरेपी, काष्मिक रे थेरेपी, मैग्न्रेटोथेरेपी, एकूपंचर, एरोमा थेरेपी, हिप्नोथेरेपी इत्यादि अनेकों प्रकार की पद्धतियाँ प्रचलित होते हुए भी निकाली जाए, मानवता को स्वास्थ्य संकट से मुक्ति दिलायी जाए । जितनी ही यह मांग बढ़ रही है, उतनी ही मात्रा में व्याधियों की संख्या व भिन्नता भी । 'ड्रग रेजिस्टेन्स' एवं 'ड्रग डिपेण्डेन्स' जैसी समस्याओं ने वैज्ञानिक जगत को उद्वेलित किया व एक नितांत सुरक्षित, प्राकृतिक जीवन क्रम से मिलती-जुलती सहज सुलभ चिकित्सा पद्धति के आविष्कार हेतु विवश किया है ।

यह एक विडम्बना ही है कि जिन वनौषधियों के प्रयोग के कारण भारतवर्ष की विशिष्टता एवं सम्पन्नता आंकी जाती थी उनके प्रयोग को भारतवासी ही भुला बैठे हैं । पश्चिम जर्मनी, हंगरी, सोवियत रूस, इण्डोनेशिया, चीन, जापान जैसे देशों में जहाँ जड़ी बूटियों से चिकित्सा पर अनुसंधान कार्य होकर सफल प्रयोग भी किए जा रहे हैं । आयुर्वेद वनौषधि संपदा की गरिमा भुला देने का कारण कहीं खोजा जाए तो इसे मात्र बौद्धिक परावलम्बन ही कहा जाएगा ।

वैक्सीन्स, मारक एण्टीबायोटिक्स, रेडिएशन, तथाकथित स्वास्थ्य संवर्धक विटामिन हारमोन्स गणों के घातक दुष्परिणामों पर सभी विचारशीलों ने गहराई से सोचा है, वे इसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि यदि कोई निरापद जीवनीशक्ति संवर्धन औषधियाँ ही हैं । आहार-विहार के सामान्य नियमों का पालन करते श्रम व्यायाम को जीवन में स्थान देते हुए मनुष्य सहज ही अपनी अंतः की सामर्थ्य को बढ़ा व प्रखर बना सकता है । आधि-व्याधियों से रोकथाम हेतु आवश्यकता आ ही पड़े तो चारों ओर सहज ही उपलब्ध वनौषधियों से वह अपनी चिकित्सा भी करता रह सकता है । वह पद्धति हानि रहित तो है ही, आर्थिक दृष्टि से भी हमारे जैसे विकासशील राष्ट्र के लिए एक मात्र अवलंबन भी है ।

उपलब्ध आधुनिक औषधियों को उपेक्षा से तो नहीं देखा जाना चाहिए पर जरा शब्दार्थ की दृष्टि से एलोपैथी शब्द का विवेचन कर लिया जाए तो कोई हानि नहीं । एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका 1961 के अनुसार एलोपैथी वह चिकित्सा पद्धति है जो औषधि के प्रयोग द्वारा उस व्याधि के अतिरिक्त अन्य नए लक्षण पैदा करती है । भावार्थ यही है कि एक बीमारी का उपचार अन्यान्य रोगों को जन्म देता है ।


आज इसी विषय को ध्यान में रखते हुए आयुर्वेद की तरफ सबका ध्यान जाता है, और मेने इसी विषय को लेकर जयपुर (राजस्थान) निवासी पं.संजय कल्ला जी से वार्तालाप किया. तो पं. जी ने मुझे कुछ आयुर्वेद के अनुभूत प्रयोग बताए जो स्वयं सिद्ध है और प्रत्येक मनुष्य आसानी से कर भी सकता है और अत्यंत लाभ प्राप्त कर सकता है. मै आभारी हूं पं. संजय कल्ला जी का, जिन्होंने ये आयुर्वेद के गुण मुझे बताए और मै उसे आपके समक्ष रख रहा हूं

1:- आज अधिकांश युवाओं को सफेद बाल की समस्या परेशान कर रही है। असमय सफेद बाल से बचने के लिए युवा कई तरह के जतन करते हैं। कई दवाइयों, शैम्पू आदि का प्रयोग करते हैं। काफी पैसा लगाने के बाद भी बाल सफेद होने से नहीं रोक पाते। आइए हम आपको बताते हैं कुछ घरेलू नुस्खे, जिसको अपना कर आप अपने बालों को सफेद होने से बचा सकते हैं।

पुदीना, अमरबेल, मेहंदी, नीम और बेर की ताजी पत्तियों को पानी से अच्छी तरह धोकर साफ कर लें। अब इसे पत्थर पर रखकर पीस लें और तैयार पदार्थ को कटोरे में रख लें। एक लोहे की कड़ाही में काले तिल या नारियल का तेल लें और कटोरे में रखे पदार्थ को इसमें डालकर आंच पर चढ़ाकर गर्म करें। तेल को तब तक गर्म करते रहें, जब तक कि डाला गया पदार्थ जलकर काला न हो जाय। ऐसा होने के बाद तेल से झाग आने लगेगा। जब झाग आने लगे, तो समझिए कि आपका तेल तैयार हो गया है। अब इस कड़ाही को किसी सुरक्षित जगह पर तीन दिनों तक ढक कर रखें। ध्यान रहे कि इस दौरान कोई इसे हिलाने-डुलाने न पाये। चौथे दिन इस तेल को सूती कपड़े की सहायता से छान लें। आप इस तेल को जिस बर्तन में रखना चाहें, रख लें।

रात को सोने से पहले इस तेल को अपने बालों में इस तरह से लगाएं कि यह जड़ों तक पहुंच जाए। इसके नियमित इस्तेमाल से आपके बाल सफेद से काले होने लगेंगे। इसके अलावा अगर आपको नींद न आने की समस्या थी, तो वह भी दूर हो जाएगी। यह तेल आपके सिर को शीतलता प्रदान करता है।

इसके इस्तेमाल से आपके बालों को काफी फायदा होगा, लेकिन एक सख्त चेतावनी है कि इसके इस्तेमाल के दौरान अपने बालों में किसी भी अन्य तेल, साबुन और शैम्पू का प्रयोग न करें। अपने बालों को धोने के लिए मुल्तानी मिट्टी या खेत की काली मिट्टी का प्रयोग कर सकते हैं। एक बात और कभी-भी गीले बालों के ऊपर इस तेल का प्रयोग न करें।

2:- थोड़ी देर तक बैठे रहने के बाद आप जैसे ही उठते हैं, आपके आंखों के सामने अंधेरा छा जाता है, आपको चक्कर आने लगते हैं। ऐसा लगता होगा कि आपके चारो ओर की चीजें तेजी से घूम रही हैं। आज हम चक्कर आने की बीमारी के निदान के बारे में आपको बताएंगे ----

एक सूखी, लम्बी या गोल लौकी जो पकने के बाद अपने आप सूख चुकी हो, लेकर इसे डंठल की तरफ से काट दें, ताकि अन्दर का खोखलापन दिखाई दे। इसके अन्दर बीज या सूखा गूदा हो, तो हिला-हिलाकर गिरा दें। इसमें ऊपर तक पानी भरकर 12 घंटे तक रखें और फिर हिलाते हुए पानी निकाल कर साफ कपड़े से दो बार छान लें।

इस पानी को ऐसे बर्तन में भरें, जिसमें अपनी नाक डुबो सकें। नाक डुबोकर खूब जोर से सांस खींचें ताकि पानी नाक से अन्दर चढ़ जाए। दिनभर नाक से पानी टपकता रहेगा। पानी खींचने के बाद नाक नीची करके आराम करें। उपचार के इस तरीके से चक्कर आने को रोग हमेशा के लिए दूर हो जाएगा।
3:- गर्मी के दिनों में पसीने और वर्षा के दिनों में उमस व भिगने के कारण त्वचा से संबंधित कई तरह की बीमारियां हो जाती हैं। ऐसे में अपनी त्वचा का बचाव करना जरूरी हो जाता है, लेकिन जब तमाम तरह के जरूरी उपायों को करने के बाद भी आपकी त्वचा को इस मौसम में होने वाले व्याधि आकर घेर लें, तो क्या करेंगे। बहरहाल, हम यहां कुछ घरेलू नुस्खे बता रहे हैं, जिनको आजमा कर आप अपने त्वचा को सही सलामत रख सकते हैं।

हल्दी, लाल चन्दन, नीम की छाल, चिरायता, हरड़े, बहेड़ा, आंवला और अडूसे के पत्ते को एक समान मात्रा में लें। इन सभी को पानी में फूलने के लिए भिगो दें। फूलने के बाद इनको पीसकर ढ़ीला पेस्ट बना लें। अब इस पेस्ट से चार गुनी अधिक मात्रा में तिल का तेल लें। तिल के तेल से चार गुनी मात्रा में पानी लें और सबको एक बर्तन में मिला लें। इस मिश्रण को मंद आंच पर तब तक गर्म करते रहें, जब तक की सारा पानी भाप बनकर उड़ नहीं जाता। अब बचे तेल को उपयुक्त बर्तन में रख लें।

अब जहां कहीं भी आपके शरीर में खुजली होती हो, वहां या पूरे शरीर में इसे लगाएं। इसके लगाते रहने से आपके त्वचा की रोग समाप्त हो जाएगी। इसका इस्तेमाल स्नान से पहले और रात में सोने के ठीक पहले करें।

4:- अपनी सेहत को तनदुरूस्त रखने के लिए हमारे द्वारा बताए जा रहे सरल और आसान मंत्रों को अमल में लाएं, आपको जरूर फायदा होगा।

बदन में थकान से दर्द हो रहा है, तो सरसों के तेल में नमक मिलाकर हल्का गर्म कर लें। अब पूरे बदन पर इसकी मालिश करें और गर्म पानी से नहा लें।

मूंग की दाल को रात में भिगने के लिए छोड़ दें और सुबह उसमें 2 लौंग डालकर बना लें। इस तरह से पकी दाल पहले की तुलना में अधिक सुपाच्य होगी।

जामुन पर आपका दिल आ गया और आपने उसे कुछ ज्यादा ही खा लिया। अब आपका जी मिचला रहा है, तो आम की एक फांक खा लें। इससे तत्काल आराम मिलेगा।

पांव की ऐड़ियां फट गई हों, तो बने गढ्ढों में सरसों का तेल और मोम पिघलाकर भर दें। इसके बाद सूखी मेहंदी बुरक दें। ऐसा करने से काफी लाभ मिलेगा।

काली मिर्च और मिश्री को एक साथ चबाने से गले की खराश तत्काल दूर हो जाती है।

मूली ज्यादा खा ली है, तो थोड़ा-सा अजवायन खा लें। इससे अपच नहीं होगी।

मेथी और अजवायन को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें। अब इसका सेवन खाना खाने के बाद गुनगुने पानी के साथ करें। गैस, अपच और कब्ज की शिकायत नहीं होगी।

कुछ ज्यादा ही केला खा लिया है, तो एक इलायची भी खा लें। सब हजम हो जाएगा।

आपको हिचकी आ रही है, तो मूली के तीन-चार पत्ते खा लें।

5:- मूली को खाने के बाद मुंह से जरूर बदबू आती है, लेकिन यह हमारे पेट के हाजमें के लिए बड़ा ही उपयोगी होता है। मूली एक पाचक की तरह काम करता है। अगर आप खाने के साथ मूली को खाते हैं, तो खाना आसानी से हजम होगा ही, साथ ही सुबह पेट भी साफ आएगा।

आज हम सर्वसुलभ मूली के ढ़ेर सारे अनमोल गुणों के बारे जानेंगे ---

यकृत व प्लीहा के रोगियों को अपने दैनिक भोजन में मूली का जमकर सेवन करना चाहिए। इससे रोग में लाभ मिलता है।

पेट से संबंधित बीमारियों में मूली का खार/रस विशेष लाभ पहुंचाता है।

अगर आपको पेट में भारीपन महसूस हो रहा है, तो मूली के रस को नमक मिलाकर पी लीजिए।

मूत्ररोग की शिकायत होने पर मूली के रस का सेवन करें। इससे फायदा होता है।

मूली का रस रुचिकर एवं हृदय को प्रफुल्लित करने वाला होता है। यह हलका एवं कंठशोधक भी होता है।

गले की सूजन में मूली का पानी, सेंधा नमक को मिलाकर इसे गरम करें और फिर इससे गरारा करें। इससे सूजन में लाभ होगा।

मूली की राख को सरसों के तेल में फेंटकर मालिश करने से शोथ दूर हो जाता है।

मूली के पतले कतरन को सिरके में डालकर धूप में रख दीजिए और रंग बादामी होने पर इसे खाइए। इससे जठराग्नि तेज हो जाएगी।

घी में मूली को भूनकर खाने से वात-पित्त और कफ में फायदा होता है।


मूली के पतले कतरन को सिरके में डालकर धूप में रख दीजिए और रंग बादामी होने पर इसे खाइए। इससे जठराग्नि तेज हो जाएगी।

घी में मूली को भूनकर खाने से वात-पित्त और कफ में फायदा होता है।

शेष अगले भाग में.........


शुभमस्तु!!


9 टिप्‍पणियां:

  1. आपके यहाँ कभी भी निराशा हाथ नहीं लगती है हमेशा काम की बाते मिल ही जाती है।

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  2. धन्यवाद संदीप जी , आपका स्वागत है.

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  3. Pandit G se aap to vedh ban gaye.

    upyogi jankeri di hai aapne.

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  4. यह सब जानकारी हमारे प्रिय मित्र संजय कल्ला जी (जयपुर ) ने उपलब्ध कराई है.

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  5. name-manoj shriram pal2,D/O/B 08/11/1974, PLACE-JAUNPUR U.P,TIME-04AM please send janam kundali

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