जय श्री कृष्णः.श्री कृष्ण शरणं मम.श्री कृष्ण शरणं मम.चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः। स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत । तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥ जय श्री कृष्णः

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

सुख – सम्पन्नता का द्वार “दक्षिण”



वास्तु शास्त्र के पीछे पूर्णतः वैज्ञानिक दृष्टिकोण छिपा है, इसमें सूर्य की रश्मियों, पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र तथा भौगोलिक स्थिति का पूरा पूरा ध्यान किसी भी निर्माण कार्य से पूर्व रखा जाता है. निर्माण चाहे झौपड़ी का हो या फिर किसी अट्टालिका का, उद्देश्य यही होता है कि विभिन्न दुष्प्रभाव पैदा करने वाली रेडियो धर्मिता को कैसे दूर किया जाए जिससे कि व्यक्ति पर आर्थिक, दैहिक और अध्यात्मिक सुःप्रभाव अधिकाधिक हो. 
यदि निर्माण कार्य होना है तो यही परामर्श दिया जाएगा कि वह वास्तु नियमों के अनुकूल ही हो. परन्तु यदि निर्माण कार्य संपन्न हो चुका हो तो उसके वास्तु दोष निवारण हेतु यथा संभव उपक्रम अवश्य कर लेने चाहिए अन्यथा चित्त की शान्ति नहीं मिल पाएगी.
दक्षिण वह दिशा है, जो कि सूर्योदय के समय सूर्य की ओर मुख करने पर दांए हाथ की ओर जाती है. यह उत्तर दिशा के ठीक विपरीत होती है. दक्षिण दिशा में पृथ्वी तत्व को व्याप्त माना गया है. यम की स्वामित्व वाली इस दिशा को मुक्ति कारक माना गया है. 
दक्षिणमुखी प्रवेश द्वार वाले भवन – स्वामी की प्रकृति में धैर्य तथा स्थिरता का विशेष स्थान रहता है. इस दिशा के बारे में अनेक ग्रंथों कुछ शुभ और अशुभ लक्षणों की बात कही गयी है. वास्तु के नियमों अनुसार दक्षिण दिशा में हमें क्या बनाना चाहिए ओर क्या नहीं ? किसके बनाने से क्या दोष उत्पन्न होते हाइ और इन दोषों से किस प्रकार मुक्त हुआ जा सकता है, इसके बारें में जाने....

१:- भवन निर्माण करते समय इस दिशा को पूर्णतयाः बन्द रखना चाहिए और भवन निर्माण करते समय सर्वप्रथम दक्षिण भाग को कवर करना चाहिए और यहां पर भारी सामान या निर्माण करना चाहिए. यदि यह दिशा दूषित होगी या खुली होगी तो यह शत्रु भय या रोग प्रदान करने वाली होती है.
२:- यदि मकान के दक्षिण भाग का द्वार आग्नेय कोण की ओर हो तो चोरी, अदालत अथवा अग्नि का भय सदैव बना रहेगा. यदि द्वार के सामने कोई दीवार, मकान आदि बना हुआ हो तो शुभ फलकारक होगी. यदि सामने कोई गड्ढा, मैदान हो या वहां अन्धेरा रहता हो तो गृहस्वामी के सभी भाई भारी कष्ट उठाएँगे.
३:- यदि दक्षिण भाग में खाली स्थान अधिक हो तो धन की हानि, अकारण झगड़े तथा स्त्रियों के मन में अशांति रहेगी.
४:- यदि दक्षिण दिशा में पूजा का स्थान या बेडरूम हो तो गृहस्वामी पूजा पाठ केवल दिखावे के लिए करेगा या उसे पूजा पाठ का फल नहीं मिलेगा.
५:- यदि मकान के दक्षिण में पुस्तक रखी हो तो, बच्चों की पढाई में बाधा उत्पन्न होगी.
६:- दक्षिण भाग में होने वाला कुआं या बोरवेल अथवा सबमर्सिबल आदि पानी का स्रोत हो तो असाध्य रोग तथा आकस्मिक दुर्घटना होती है.
७:- घर में बाथरूम के लिए उत्तम स्थान दक्षिण दिशा या नैॠत्य कोण के मध्य शुभ होता है.
८:- यदि घर का मुख्य द्वार दक्षिण दिशा की ओर हो तो आपको बालकनी दक्षिण – पूर्व दिशा की ओर बनानी चाहिए.
९:- यदि भूखंड का मुंह दक्षिण दिशा की ओर हो तो मुख्य द्वार का निर्माण दक्षिण दिशा के मध्य या आग्नेय कोण दिशा में करवाना चाहिए.
१०:- यदि आप पर्यावरण के शौक़ीन है और अपने घर के आस पास हरियाली और पेड लगाना चाहते है तो दक्षिण पश्चिम दिशा में ऊंचे कद वाले पेड लगा सकते है.
११:- विद्यार्थियों को हमेशा पश्चिम की ओर या दक्षिण की ओर सिर करके सोना चाहिए.
१२:- दिनभर की भागादोडी के बाद व्यक्ति आराम करना चाहता है, सभी चिंताओं से मुक्त होकर सुख चेन की नींद लेना चाहता है, अतः वास्तुनुसार शयन कक्ष सदैव दक्षिण पश्चिम दिशा में बनाना चाहिए. इससे भू स्वामी को उत्तम नींद की प्राप्ति होती है.

उपरोक्त विवरण को पढ़ कर आप समझ गए होंगे कि भवन निर्माण करवाते समय वास्तुनुसार किन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, और हमारे घर में दक्षिण दिशा का क्या महत्व है. अधिक जानकारी के लिए मुझे मेल कर शंका का समाधान पा सकते है.


शुभमस्तु !!


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

कृपया अपने प्रश्न / comments नीचे दिए गए लिंक को क्लिक कर के लिखें

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails

लिखिए अपनी भाषा में