जय श्री कृष्णः.श्री कृष्ण शरणं मम.श्री कृष्ण शरणं मम.चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः। स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत । तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥ जय श्री कृष्णः

सोमवार, 7 जनवरी 2013

रमल ज्योतिष.....3


रमल के अनुसार कुण्डली कैसे बनाएँ ?


प्रस्तार बनाने के लिए रमल में अनेक विधियाँ बताई गई हैं। पासों के प्रयोग से प्रस्तार बनाने को अरबी ज्योतिष में प्रधानता दी गई है। यदि पासे उपलब्ध नहीं हो, तो प्रश्नकर्ता से एक से सौ के मध्य चार अंक बुलवाकर रमल कुण्डली (प्रस्तार) बनाई जा सकती है।

पासा (पाशक) द्वाराः-

जब कोई प्रश्नकर्ता अपना प्रश्न करे उस समय रमलाचार्य को अपने इष्टदेव एवं उनके मन्त्र का मानसिक ध्यान एवं स्मरण करते हुए पासों को हाथ में लेकर समतल भूमि, लकड़ी के तख्ते आदि स्वच्छ एवं पवित्र स्थान पर छोड़ना चाहिए। 

उसके बाद दोनों पासों को परस्पर सटाकर उनपर अंकित बिन्दु एवं लकीरों की आकृति को कागज पर उतार लेना चाहिए। इस प्रकार चार बार (यदि दो पासों को इस्तेमाल किया जा रहा हो) पासे डाल कर चार शक्लें प्राप्त करते हैं। रमल की कुण्डली में ये प्रथम चार शक्लें पासों के द्वारा प्राप्त होती है।

उदाहरण स्वरुप यदि किसी प्रश्न का विचार करते समय पासे डाले गये हों और उन पर चित्र के समान पासों के ऊपरी सिरों (आकाश की ओर सतह) पर बिन्दु अंकित हों तो दोनों पासों को परस्पर सटाने से निम्नप्रकार से शक्लें प्राप्त होती हैं।



इन शक्लों में दो बिन्दुओं से मिलकर एक रेखा बनती है। अतः बराबर ऊँचाई वाले दो बिन्दुओं को लकीर बनाकर देखने पर निम्न प्रकार की शक्लें ले लेती हैं।





चौथे घर की शक्ल
तीसरे घर की शक्ल
दूसरे घर की शक्ल
पहले घर की शक्ल
इस प्रकार पासों के द्वारा प्रस्तार की प्रथम चार शक्लें प्राप्त होती हैं। जिन्हें रमल में मातृपंक्ति की शक्लें कहा गया है। 

रमल में शक्लों का क्रम दाएँ से बाएँ होती है। अतः उक्त उदाहरण में प्रथम शक्ल लह्यान आती है। 

 दूसरे में उक़ला, तीसरे में अंकीस तथा चौथे में नुस्त्रुल खारिज आती है। पाँचवे घर की शक्ल पहले, दूसरे, तीसरे तथा चौथे घर की शक्लों के ऊपरी चिह्न को ऊपर से नीचे क्रमानुसार व्यवस्थित करने पर प्राप्त होती है।

इसी प्रकार सातवें एवं आठवें घर की शक्लें मातृपंक्ति की सहायता से बनाई जाती हैं।जैसा चित्र में दर्शाया गया है

इसके उपरान्त नवें घर की शक्ल प्राप्त करने के लिए प्रथम तथा द्वितीय घर की शक्लों का परस्पर गुणन करके प्राप्त नई शक्ल को नवें स्थान पर रखना चाहिए। गुणा करने की विधि इस प्रकार हैः- 


बिन्दु एवं बिन्दु का गुणनफल रेखा। रेखा एवं रेखा का गुणनफल रेखा। बिन्दु एवं रेखा का गुणनफल बिन्दु होता है।



इस सूत्र को ध्यान में रखते हुए पहले तथा दूसरे घरों की शक्लों को गुणा करने पर नवें घर की शक्ल प्राप्त होती है। 

तृतीय तथा चौथे घर की शक्ल का गुणनफल दसवें घर की शक्ल होती है। पाँचवें तथा छठे घर की शक्ल का गुणनफल से ग्यारहवें घर की शक्ल तथा इसी प्रकार सातवें तथा आठवें से बारहवाँ घर, नवें तथा दसवें से तेरहवाँ घर, ग्यारहवें तथा बारहवें से चौदहवां घर, तेरहवें तथा चौदहवें से पन्द्रहवाँ घर तथा पन्द्रहवें व पहले घर के गुणन से सोलहवें घर की शक्ल प्राप्त होती है।




x

=


x

=

दूसरे घर की शक्ल
पहले घर की शक्ल
नवें घर की शक्ल
चौथे घर की शक्ल
तीसरे घर की शक्ल
दसवें घर की शक्ल


x

=


x

=

छठे घर की शक्ल
पाँचवें घर की शक्ल
ग्यारहवें घर की शक्ल
आठवें घर की शक्ल
सातवें घर की शक्ल
बारहवें घर की शक्ल


x

=


x

=

दसवें घर की शक्ल
नवें घर की शक्ल
तेरहवें घर की शक्ल
बारहवें घर की शक्ल
ग्यारहवें घर की शक्ल
चौदहवें घर की शक्ल


x

=


x

=

चौदहवें घर की शक्ल
तेरहवें घर की शक्ल
पन्द्रहवें घर की शक्ल
पहले घर की शक्ल
पन्द्रहवें घर की शक्ल
सोलहवेँ घर की शक्ल

इस प्रकार रमल के पासों से प्राप्त प्रथम चार शक्लों से द्वारा सभी सोलह शक्लें बनाकर प्रस्तार बनाना चाहिए। प्रस्तार में विभिन्न घरों की स्थिति निश्चित होती है। उदाहरण कुण्डली में प्रस्तार का स्वरुप इस प्रकार होगा।








आठवाँ घर
सातवाँ घर
छठा घर
पाँचवाँ घर
चौथा घर
तीसरा घर
दूसरा घर
पहला घर




बारहवां घर
ग्यारहवां घर
दसवां घर
नौवां घर


चौदहवां घर
तेरहवां घर


पन्द्रहवां घर
सोलहवां घर
ध्यातव्य बिन्दुः-
१॰ रमल में बिन्दु एवं रेखा के द्वारा १६ शक्लों की सहायता से प्रस्तार बनाकर फलादेश किया जाता है। प्रस्तार में एक ही शक्ल कई बार आ सकती है तथा कुछ शक्लें अनुपस्थित भी हो सकती है।

२॰ प्रस्तार में सोलहवें घर में यदि चार रेखाओं वाली जमात शक्ल आ जाए, तो प्रस्तार को बन्द हुआ माना जाता है। ऐसी स्थिति में उस प्रस्तार से फल का विचार नहीं किया जाता तथा पुनः पासे डालकर नया प्रस्तार बनाकर प्रश्न का उत्तर खोजना चाहिए। यदि दुबारा पासे डालने पर पुनः प्रस्तार बन्द हो जाए, तो उस प्रश्न का उत्तर नहीं जानना चाहिए। तीन माह बाद फिर कोशिश की जा सकती है।

३॰ शकुन पंक्ति क्रम में विभिन्न १६ शक्लें बाएँ से दाएँ क्रम में ऊपर दिये गए चित्र के अनुसार आती हैं।

४॰ प्रस्तार शुद्ध बना है अथवा अशुद्ध इसकी जाँच करने के लिए प्रस्तार के पन्द्रहवें घर की शक्ल को देखना चाहिए। यदि प्रस्तार शुद्ध होगा तो इसमें हमेशा दो बिन्दुओं वाली शक्लें आएँगी। एक या तीन बिन्दु वाली शक्ल आने पर प्रस्तार में निश्चय ही कहीं त्रुटि है, ऐसा समझना चाहिए।



अंकों द्वाराः-

जिन व्यक्तियों के पास पासे उपलब्ध नहीं हो, वे अंकों की सहायता से भी प्रस्तार तैयार कर सकते हैं। 

इसके लिए प्रश्नकर्ता को अपने प्रश्न का चिन्तन करते हुए एक सादा कागज पर दाएँ से बाएँ १ से लेकर १०० के मध्य कोई चार संख्या लिखनी चाहिए। यथाः-



यदि ये संख्याएं 16 से बड़ी हों, तो उनमें 16 से भाग कर शेषफल को प्रस्तार बनाने के लिए प्रयोग में लेना चाहिए। 

इस प्रकार चार संख्याएँ जो कि एक से लेकर अधिकतम सोलह तह होंगी प्राप्त हो जाएँगी। इन संख्याओं के अनुसार शकुन पंक्ति के क्रम में जो संख्याएँ दी गई हों

उन्हें लेकर प्रस्तार की प्रथम चार शक्लें बना लेनी चाहिए। 

शकुन पंक्ति का क्रम ऊपर देख लें। यथाः- लह्यान, कब्जुल दाखिल, कब्जुल खारिज आदि। इस बात को निम्न उदाहरण के द्वारा समझें।
26
23
54
17
चौथी संख्या
तीसरी संख्या
दूसरी संख्या
पहली संख्या



यदि किसी प्रश्नकर्ता द्वारा निम्न संख्याएँ प्रस्तार बनाने हेतु लिखी गई हो, तो १६ से बड़ी संख्याओं में १६ का भाग देकर उनके स्थान पर शेषफल लिखना चाहिए। १६ से भाग देने पर संख्याएँ निम्नवत् होंगीः

17/16=3, शेषफल 1 (पहली संख्या)

54/16=2, शेषफल 6 (दूसरी संख्या)

23/16=1, शेषफल 7 (तीसरी संख्या)

26/16=1, शेषफल 10 (चौथी संख्या)

यदि किसी संख्या में सोलह का पूरा-पूरा भाग जाता है तो वह संख्या 16 मानी जाएगी। 

इस प्रकार प्राप्त संख्याओं के अनुसार शकुनपंक्ति क्रम में जो शक्लें होंगी, उसी के अनुसार मातृपंक्ति की प्रथम चार शक्लें प्राप्त हो जाएँगी। 

शेष घरों की शक्लें पूर्वोक्तानुसार ही बनेगी।

शक्लों की प्रकृति
अरबी ज्योतिष में सभी १६ शक्लों को खारिज, दाखिल, साबित और मुंकलिब चार प्रकृतियों में विभाजित किया गया है। 

इन प्रकृतियों का फलादेश में विशिष्ट उपयोग होता है। शक्ल की प्रकृति भिन्न-भिन्न प्रश्नों के लिए भिन्न-भिन्न शुभाशुभ परिणाम देती है-

१॰ खारिज शक्लः- जिनमें ऊपर की ओर शून्य एवं नीचे रेखा होती हैं। यथा-लह्यान, कब्जुल खारिज, नस्त्रुल खारिज तथा अतवे खारिज।

२॰ दाखिल शक्लः- जिनमें ऊपर की ओर रेखा एवं नीचे शून्य होता हैं। यथा-कब्जुल दाखिल, अंकीस, नस्त्रुल दाखिल तथा अवते दाखिल।

३॰ साबित शक्लः- जिनमें ऊपर तथा नीचे दोनों ओर रेखाऐँ होती हैं। यथा-जमात, हुमरा, बयाज तथा इज्जतमा।

४॰ मुंकलिब शक्लः- जिनमें ऊपर तथा नीचे दोनों ओर बिन्दु होते हैं। यथा-फरहा, उक़ला, नकी तथा तरीक।

शक्लों की प्रकृति
प्रकृति
शक्लों का स्वरुप
खारिज
लह्यान
कब्जुल
नस्त्रुल
अतवे
दाखिल
कब्जुल
अंकीस
नस्त्रुल
अवते
साबित
जमात
हुमरा
बयाज
इज्जतमा
मुंकलिब
फरहा
उक़ला
नकी
तरीक

यदि प्रश्नकर्ता का प्रश्न किसी वस्तु अथवा व्यक्ति की प्राप्ति से सम्बन्धित है, तो दाखिल शक्ल शुभ होती है। साबित शक्ल भी ऐसे प्रश्नों में अनुकूल मानी जाती है।
यदि प्रश्नकर्ता का प्रश्न यात्रा, स्थान-परिवर्तन, स्थानान्तरण से सम्बन्धित है, तो सम्बन्धित घर में मुंकलिब शक्ल शुभ होती है।
यदि प्रश्नकर्ता का प्रश्न किसी व्यक्ति अथवा वस्तु के छिनने से सम्बन्धित है, तो ऐसे प्रश्न में प्रश्न के घर में साबित शक्ल यथास्थिति को प्रदर्शित करती है अर्थात् यदि नौकरी में स्थानान्तरण का प्रश्न हो, तो दसवें घर में साबित शक्ल स्थानान्तरण की सम्भावना को नकारती है।

शक्लों के तत्त्व
तत्त्व
शक्लों का स्वरुप
अग्नि
लह्यान
कब्जुल
नस्त्रुल
अतवे
वायु
फरहा
अवते
हुमरा
इज्जतमा
पृथ्वी
बयाज
नस्त्रुल
नकी
तरीक
जल
कब्जुल
जमात
उक़ला
अंकीस


 घरों के तत्त्व ........

पहला घर
अग्नि
पाँचवा घर
अग्नि
नवाँ घर
अग्नि
तेरहवाँ घर
अग्नि
दूसरा घर
वायु
छठा घर
वायु
दसवाँ घर
वायु
चौदहवाँ घर
वायु
तीसरा घर
जल
सातवाँ घर
जल
ग्यारहवाँ घर
जल
पन्द्रहवाँ घर
जल
चौथा घर
पृथ्वी
आठवाँ घर
पृथ्वी
बारहवाँ घर
पृथ्वी
सोलहवाँ घर
पृथ्वी



सम्बन्ध
तत्त्व
तत्त्व
मित्र
अग्नि-वायु
जल-पृथ्वी
सम
अग्नि-पृथ्वी
जल-वायु
शत्रु
अग्नि-जल
वायु-पृथ्वी



शुभमस्तु !!!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

कृपया अपने प्रश्न / comments नीचे दिए गए लिंक को क्लिक कर के लिखें

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails

लिखिए अपनी भाषा में