जय श्री कृष्णः.श्री कृष्ण शरणं मम.श्री कृष्ण शरणं मम.चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः। स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत । तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥ जय श्री कृष्णः

शनिवार, 19 जनवरी 2013

भगवान् सूर्य की उपासना से कामना पूर्ण करें....



प्रत्येक रविवार को सूर्य पूजन और सूर्य मंत्र का 108 बार जाप करने से अवश्य लाभ मिलता है।

अगर भाषा व उच्चारण शुद्ध हो तो आदित्य ह्रदय स्तोत्र का पाठ अवश्य करें। यह अनुभूत प्रयोग है।

रविवार के दिन नीचे दिए गए मंत्रों में से जो भी मंत्र आसानी से याद हो सकें उसके द्वारा सूर्य देव का पूजन-अर्चन करें। 

फिर अपनी मनोकामना मन ही मन बोलें। भगवान सूर्य नारायण आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण करेंगे।

1. ॐ घृ‍णिं सूर्य्य: आदित्य:

2. ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्रकिरणराय मनोवांछित फलम् देहि देहि स्वाहा।।

3. ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजो राशे जगत्पते, अनुकंपयेमां भक्त्या, गृहाणार्घय दिवाकर:।

4. ॐ ह्रीं घृणिः सूर्य आदित्यः क्लीं ॐ ।

5. ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः ।

समस्त यौगिक क्रियाओं की भांति सूर्य नमस्कार को सर्वांग व्‍यायाम कहा जाता है।

सूर्य नमस्कार सदैव खुली हवादार जगह पर कंबल का आसन बिछा कर खाली पेट अभ्यास करना चाहिए।

सूर्य नमस्कार करने से मन शांत और प्रसन्न होता है बारह सूर्य नमस्कार मंत्र इस प्रकार है......

* ॐ सूर्याय नम: ।
* ॐ भास्कराय नम:।
* ॐ रवये नम: ।
* ॐ मित्राय नम: ।
* ॐ भानवे नम:
* ॐ खगय नम: ।
* ॐ पुष्णे नम: ।
* ॐ मारिचाये नम: ।
* ॐ आदित्याय नम: ।
* ॐ सावित्रे नम: ।
* ॐ आर्काय नम: ।
* ॐ हिरण्यगर्भाय नम: ।

जीवन के सभी पाप व् रोगों का नाश करने के लिए निम्न प्रयोग अवश्य करें, अति शीघ्र लाभ प्राप्त होगा.

विनियोग- 
 ॐ अस्य श्रीसूर्य-स्तव-राज-स्तोत्रस्य श्रीवशिष्ठ ऋषिः। अनुष्टुप् छन्दः। श्री-सूर्यो देवता।

 सर्व-पाप-क्षय-पूर्वक-सर्व-रोगोपशमनार्थे पाठे विनियोगः।

 ऋष्यादि-न्यास- 
श्रीवशिष्ठ ऋषये नमः शिरसि। अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे। श्री-सूर्यो देवाय नमः हृदि। सर्व-पाप-क्षय-पूर्वक-सर्व-रोगोपशमनार्थे पाठे विनियोगाय नमः अञ्जलौ।

 ध्यान-

 ॐ रथस्थं चिन्तयेद् भानुं, द्वि-भुजं रक्त-वाससे।

 
दाडिमी-पुष्प-संकाश, पद्मादिभिः अलंकृतम्।।

 मानस पूजन कर स्तोत्र-पाठ करें-

 
ॐ विकर्तनो विवस्वांश्च, मार्त्तण्डो भास्करो रविः। लोक-प्रकाशकः श्रीमान् लोक-चक्षुग्रहेश्वरः।।

 लोक-साक्षी त्रिलोकेशः, कर्त्ता-हर्ता तमिस्रहा। तपनः चैव, शुचिः सप्ताश्व-वाहनः।।

 
गभस्तिहतो ब्रह्मा च, सर्व-देव-नमस्कृतः। एक-विंशति इत्येष, स्तव इष्टः सदा मम।।

 
 ।।फल-श्रुति।।

 श्रीः आरोग्य-करः चैव, धन-वृद्धिः यशस्करः। स्तव-राज इति खयातः, त्रिषु लोकेषु विश्रुतः।।

 
यः एतेन महा-बाहो, द्वे सन्ध्ये स्तिमितोदये। स्तौति मां प्रणतो भूत्त्वा, सर्व-पापैः प्रमुच्य
ते।।


 
कायिकं वाचिकं चैव, मानसं चैव दुष्कृतम्। एक-जप्येन तत् सर्व, प्रणश्यति ममाग्रतः।।

 
एक जप्यश्च होमश्च, सन्ध्योपासनमेव च। बलि-मन्त्रोऽर्घ्य-मन्त्रश्च, धुप-मन्त्रस्तथैव च।।


 अन्न-प्रदाने स्नाने च, प्रणिपाति प्रदक्षिणे। पूजितोऽयं महा-मन्त्रः, सर्व-व्याधि-हरः शुभः
।।
 
एवं उक्त्वा तु भगवान्, भास्करो जगदीश्वरः। आमन्त्र्य कृष्ण-तनयं, तत्रैवान्तरधियत।।

 सांबोऽपि स्तवराजेन, स्तुत्वा सप्ताश्ववाहनः। पूतात्मा नीरुजः श्रीमान्, तस्माद्रोगाद्विमुक्तवान्।।

 
उक्त स्तोत्र में भगवान् सूर्य के कल्याणकारी २१ नामों का उल्लेख हुआ है।

 इन नामों के प्रभाव से सभी प्रकार के रोग दूर होते हैं।




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