जय श्री कृष्णः.श्री कृष्ण शरणं मम.श्री कृष्ण शरणं मम.चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः। स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत । तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥ जय श्री कृष्णः

रविवार, 27 जनवरी 2013

हाथों ( कर माला) द्वारा जाप करें...



कबीर जी ने कहा है -



माला फेरत जुग भया, मिटा ना मन का फेर ।



कर का मन का छाड़ि के, मन का मनका फेर ।।



माला के सम्बन्ध में शास्त्रों में बहुत विचार किया गया है । यहाँ संक्षेप में उसका कुछ थोड़ा-सा 



अनुमान मात्र दिया जाता है -


माला प्रायः तीन प्रकार की होती है 

कर-माला, वर्ण-माला तथा मणि-माला ।

यहाँ हम कर माला अर्थात अपने हाथों द्वारा जाप करने की विधि का वर्णन कर रहे है...




अँगुलियों पर जो जप किया जाता है, वह 



करमाला का जप है । यह दो प्रकार से होता है 


एक तो अँगुलियों से ही गिनना और दूसरा 

अँगुलियों के पर्वों पर गिनना । शास्त्रतः दूसरा 

प्रकार ही स्वीकृत है । इसका नियम ( चित्र 

संख्या ०१) यह है कि अनामिका के मध्यभाग से 

नीचे की ओर चले, फिर कनिष्ठा के मूल से 

अग्रभाग तक और फिर अनामिका तथा मध्यमा 


के अग्रभाग पर होकर तर्जनी के मूल तक जाए । इस क्रम में अनामिका के दो, कनिष्ठा के तीन

पुनः अनामिका का एक, मध्यमा का एक और तर्जनी के तीन पर्व कुल दस संख्या होती है । 

मध्यमा के दो पर्व सुमेरु के रुप में छूट जाते हैं । साधारणतः करमाला का यही क्रम है, किन्तु 

अनुष्ठान भेद से इसमें अन्तर भी पड़ता है । जैसे शक्ति के अनुष्ठान में अनामिका के दो पर्व, कनिष्ठा 

के तीन, पुनः अनामिका का अग्रभाग एक, मध्यमा के तीन और तर्जनी का एक मूल पर्व-इस प्रकार 

दस संख्या पूरी होती है । श्रीविद्या में इससे भिन्न नियम है । मध्यमा का मूल एक, अनामिका का 

मूल एक, कनिष्ठा के तीन, अनामिका और मध्यमा के अग्रभाग एक-एक और तर्जनी के तीन इस 

प्रकार दस संख्या पूरी होती है ।

कर-माला से जप करते समय अँगुलियाँ अलग-अलग नहीं होनी चाहिए । 

थोड़ी-सी हथेली मुड़ी रहनी चाहिए । मेरु का उल्लंघन और पर्वों की सन्धि (गाँठ) का 

स्पर्श निषिद्ध है । हाथ को हृदय के सामने लाकर, अँगुलियों को कुछ टेढ़ी करके वस्त्र से 

उसे ढककर दाहिने हाथ से ही जप करना चाहिये । जप अधिक संख्या में करना हो, तो 

इन दशकों को स्मरण नहीं रखा जा सकता । इसलिये उनको स्मरण करने के लिये एक 

प्रकार की गोली बनानी चाहिये । लाक्षा, रक्त-चन्दन, सिन्दूर और गौ के सूखे कण्डे को चूर्ण 

करके सबके मिश्रण से चह गोली तैयार करनी चाहिये । अक्षत, अँगुली, अन्न, पुष्प, चन्दन 

अथवा मिट्टी से उन दशकों का स्मरण निषिद्ध है । माला की गिनती भी इनके द्वारा नहीं 

करनी चाहिये ।

शुभमस्तु !!




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