जय श्री कृष्णः.श्री कृष्ण शरणं मम.श्री कृष्ण शरणं मम.चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः। स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत । तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥ जय श्री कृष्णः

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

वास्तु के रंग, जीवन में समृद्धि के रंग.....




किसी भवन की ऊर्जा को संतुलित करना वास्तुं का मूल ध्येय है। ऊर्जा विज्ञान की एक 

उप शाखा है कम्पन विज्ञान। यदि कम्पन विज्ञान पर नजर डालें तो ज्ञात होता है कि 

ब्रहमाण्‍ड तो कम्पन का अथाह महासागर है। वस्तुओं की प्रकृतियां उनके कम्पनों के 

मुताबिक होती हैं। इस सत्य को अगरचे हम वास्तु के संदर्भ में अध्ययन करें और 

गंभीरता से देखें तो विदित होता है कि हम अपने चतुर्दिक व्यातप्त कम्पनों से प्रभावित 

हो रहे हैं। विभिन्न‍ प्रकार के ये कम्पन विद्युत चुम्‍बकीय क्वां टम अथवा एस्ट्रषल स्तर 

पर हो सकते हैं। रंग और ध्‍वनि के स्तर से ये हमको प्रभावित करते हैं। कहने की जरूरत 

नहीं है कि रंग और ध्वनि इस प्रकार की ऊर्जाएं हैं जिन्होंने प्रकृति एवं वातावरण के 

माध्यम से हमें अपने वर्तुल में घेर रखा है। यही कारण है कि वास्तु् विज्ञान में ध्वनियों 

तथा रंगों का स्‍थान अत्यंधिक महत्वपूर्ण है।


शुभ रंग भाग्योदय कारक होते हैं और अशुभ रंग भाग्य में कमी करते हैं। विभिन्न रंगों 

को वास्तु के विभिन्न तत्वों का प्रतीक माना जाता है। नीला रंग जल का, भूरा पृथ्वी का 

और लाल अग्नि का प्रतीक है। वास्तु और फेंगशुई में भी रंगों को पांच तत्वों जल

अग्नि, धातु, पृथ्वी और काष्ठ से जोड़ा गया है। इन पांचों तत्वों को अलग-अलग शाखाओं 

के रूप में जाना जाता है। इन शाखाओं को मुख्यतः दो प्रकारों में में बाँटा जाता है, ‘दिशा 

आधारित शाखाएंऔर प्रवेश आधारित शाखाएं


दिशा आधारित शाखाओं में उत्तर दिशा हेतु जल 
तत्व का प्रतिनिधित्व करने वाले रंग 

नीले और काले माने गए हैं। दक्षिण दिशा हेतु 

अग्नि तत्व का प्रतिनिधि काष्ठ तत्व है 

जिसका रंग हरा और बैंगनी है। प्रवेश आधारित 

शाखा में प्रवेश सदा उत्तर से ही माना 

जाता है, भले ही वास्तविक प्रवेश कहीं से भी 

हो। इसलिए लोग दुविधा में पड़ जाते हैं 

कि रंगों का चयन वास्तु के आधार पर करें या 

वास्तु और फेंगशुई के अनुसार। यदि 

फेंगशुई का पालन करना हो, तो दुविधा पैदा होती है कि रंग का दिशा के अनुसार चयन 

करें या प्रवेश द्वार के आधार पर। दुविधा से बचने के लिए वास्तु और रंग-चिकित्सा की 

विधि के आधार पर रंगों का चयन करना चाहिए। रंग चिकित्सा पद्दति का उपयोग किसी 

कक्ष के विशेष उद्देश्य और कक्ष की दिशा पर निर्भर करती है। रंग चिकित्सा पद्दति का 

आधार सूर्य के प्रकाश के सात रंग हैं। इन रंगों में बहुत सी बीमारियों को दूर करने की 

शक्ति होती है। इस दृष्टिकोण से उत्तर पूर्वी कक्ष, जिसे घर का सबसे पवित्र कक्ष माना 

जाता है, में सफेद या बैंगनी रंग का प्रयोग करना चाहिए। इसमें अन्य गाढे़ रंगों का 

प्रयोग कतई नहीं करना चाहिए। दक्षिण-पूर्वी कक्ष में पीले या नारंगी रंग का प्रयोग करना 

चाहिए, जबकि दक्षिण-पश्चिम कक्ष में भूरे, ऑफ व्हाइट या भूरा या पीला मिश्रित रंग 

प्रयोग करना चाहिए। यदि बिस्तर दक्षिण-पूर्वी दिशा में हो, तो कमरे में हरे रंग का प्रयोग 

करना चाहिए। उत्तर पश्चिम कक्ष के लिए सफेद रंग को छोड़कर कोई भी रंग चुन सकते 

हैं।


रंगों का महत्व हमारे जीवन पर बहुत गहरा होता है। रंग हमारे विचारों को प्रभावित 

करते हैं तथा हमारी सफलता व असफलता के कारक भी बनते हैं। आइए जानते हैं कि 

रंगों का वास्तु में क्या महत्व है—-


—–पीला रंग:- यह रंग हमें गर्माहट का अहसास देता है। इस रंग से कमरे का आकार 

पहले से थोड़ा बड़ा लगता है तथा कमरे में रोशनी की भी जरूरत कम पड़ती है। अत: 

जिस कमरे में सूर्य की रोशनी कम आती हो, वहाँ दीवारों पर हमें पीले रंग का प्रयोग 

करना चाहिए। पीला रंग सुकून व रोशनी देने वाला रंग होता है। घर के ड्राइंग रूम

ऑफिस आदि की दीवारों पर यदि आप पीला रंग करवाते हैं तो वास्तु के अनुसार यह 

शुभ होता है।


——गुलाबी रंग:- यह रंग हमें सुकून देता है तथा परिवारजनों में आत्मीयता बढ़ाता है। 

बेडरूम के लिए यह रंग बहुत ही अच्छा है।


—-नीला रंग:- यह रंग शांति और सुकून का परिचायक है। यह रंग घर में आरामदायक 

माहौल पैदा करता है। यह रंग डिप्रेशन को दूर करने में भी मदद करता है।


—- जामुनी रंग:- यह रंग धर्म और अध्यात्म का प्रतीक है। इसका हल्का शेड मन में 

ताजगी और अद्‍भुत अहसास जगाता है। बेहतर होगा यदि हम इसके हल्के शेड का ही 

दीवारों पर प्रयोग करें।


—- नारंगी रंग:- यह रंग लाल और पीले रंग के समन्वय से बनता है। यह रंग हमारे मन 

में भावनाओं और ऊर्जा का संचार करता है। इस रंग के प्रभाव से जगह थोड़ी सँकरी 

लगती है परंतु यह रंग हमारे घर को एक पांरपरिक लुक देता है।


अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार लाने के लिए आपको अपने कमरे की उत्तरी दीवार पर 

हरा रंग करना चाहिए।


—– आसमानी रंग जल तत्व को इंगित करता है। घर की उत्तरी दीवार को इस रंग से 

रंगवाना चाहिए।


—–. घर के खिड़की दरवाजे हमेशा गहरे रंगों से रंगवाएँ। बेहतर होगा कि आप इन्हें डार्क 

ब्राउन रंग से रंगवाएँ।


—-जहाँ तक संभव हो सके घर को रंगवाने हेतु हमेशा हल्के रंगों का प्रयोग करें।

वास्तु शास्त्र के अनुसार किसी भी भवन में गृहस्वामी का शयनकक्ष तथा तमाम कारखानों

कार्यालयों या अन्य भवनों में दक्षिणी-पश्चिम भाग में जी भी कक्ष हो, वहां की दीवारों व 

फर्नीचर आदि का रंग हल्का गुलाबों अथवा नींबू जैसा पीला हो, तो श्रेयस्कर रहता है। 

गुलाबी रंग को प्रेम का प्रतीक माना जाता है। यह आपसी सामंजस्य तथा सौहार्द में वृद्धि 

करता है। इस रंग के क्षेत्र में वास करने वाले जातकों की मनोभावनाओं पर इसका गहरा 

प्रभाव पड़ता है। यही वजह है कि होली जैसे, पवित्र त्यौहार पर गुलाबी रंग का प्रयोग 

सबसे ज्यादा किया जाता है। इस भाग में गहरे लाल तथा गहरे हरे रंगों का प्रयोग करने 

से जातक की मनोवृत्तियों पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

इसी प्रकार उत्तर-पश्चिम के भवन में हल्के स्लेटी रंग का प्रयोग करना उचित रहता है। 

वास्तु शास्त्र के अनुसार यह भाग घर की अविवाहित कन्याओं के रहने या अतिथियों के 

ठहरने हेतु उचित माना जाता हैं।


इस स्थान का प्रयोग मनोरंजन कक्ष, के रूप में भी किया जा सकता है। किसी कार्यालय 

के उत्तर-पश्चिम भाग में भी स्लेटी रंग का उपयोग करने की सलाह दी जाती है। इस 

स्थान का उपयोग कर्मचारियों के मनोरंजन कक्ष के रूप में किया जा सकता है। वास्तु या 

भवन के दक्षिण में बना हुआ कक्ष छोटे बच्चों के लिए उपयुक्त माना जाता है। चूंकि 

चंचलता बच्चों का स्वभाव है, इसलिए इस भाग में नारंगी रंग का प्रयोग करना उचित 

माना जाता है। इस रंग के प्रयोग से बच्चों के मन में स्फूर्ति एवं उत्साह का संचार होता 

है। इसके ठीक विपरीत इस भाग में यदि हल्के रंगों का प्रयोग किया जाता है, तो बच्चों 

में सुस्ती एवं आलस्य की वृद्धि होती है। वास्तु या भवन में पूरब की ओर बने हुए कक्ष 

का उपयोग यदि अध्ययन कक्ष के रूप में किया जाए, तो उत्तम परिणाम पाया जा सकता 

है।

पंचतत्व के रंग- हमारे शरीर का निर्माण पंच तत्वों से हुआ है। प्रत्येक तत्व के सूक्ष्म

अति सूक्ष्म अवयव हमारे शरीर में विदयमान हैं। इन अवयवों का अपना-अपना रंग होता 

है। मानव शरीर के प्रत्‍येक हिस्से का अपना आभामंडल होता है। शास्त्रों के अनुसार पंच 

तत्वों के रंगों का विभाजन कुछ इस प्रकार किया गया है। जल का रंग हरा, पृथ्वी का 

रंग नारंगी एवं बैगनी, अग्नि का रंग लाल तथा पीला, वायु का बैगनी तथा आकाश का 

रंग नीला माना गया है। रंगों का वैज्ञानिक महत्व वैज्ञानिक शोधों एवं अन्तरराष्ट्रीय स्‍तर 

पर किये गये अध्ययन के अनुसार रंगों की प्रकृति तथा प्रभाव का ज्ञान होता है। शोधों से 

जो निष्कर्ष निकलता है वह काफी महत्वपूर्ण है। चिकित्सा्, मनोविज्ञान, भवनों के 

अंदरूनी हिस्सों में रंगों का उचित रूप से प्रयोग करके कार्य क्षमता में वृद्धि तथा स्‍वास्‍थ्‍य 

के प्रति रंगों की भूमिका और प्रभाव को प्रभावित किया जा सकता है। शोधों से यह 

निष्कर्ष भी प्राप्त हुआ है कि व्‍यक्तिगत स्तर पर रंगों का चयन तब्दील हो जाता है। इससे 

पता चलता है कि भिन्न -भिन्न रंग अलग-अलग व्‍यक्तियों पर विभिन्‍न -विभिन्‍न प्रभाव 

डालते हैं। वैज्ञानिक शोधों में अधिकांश अलग-अलग समूहों पर समान प्रभाव पडने वाले 

कारणों व प्रभावों का अध्ययन किया गया है। शंका यह उठती है कि क्या वास्तव मे रंग 

 मानव के लिए बहुत प्रभावशाली है। इस शंका का निवारण करने के लिए मनुष्य स्वयं 

प्रयोग करके अपने नतीजे निकाल सकते हैं। नीले रंग के स्विमिंगपूल में तैरने से 

हाइपरटेंशन के मरीज का उच्च रक्तंचाप कम हो सकता है। यदि आप पूरे दिन लाल 

अथवा काले रंग के मोजे पहनते हैं तो रात में जब आप मोजे उतारते हैं तो काले की 

अपेक्षा लाल रंग के मोजे में पैर ज्‍यादा गर्म रहते हैं।

-गुलाबी रंग के पैक मे रंग में रखी गयी पेस्ट्रीम ज्यादा स्वादिष्ट होती हैं। लाल प्रजाति 

की काली मिर्च दिखाने पर मुर्गी के अंडों की जर्दी (पाक) लाल रंग की हो जाती है। रंग 

ऊर्जा का ही रूप हैं, ये स्‍वास्‍थ्‍य वर्धक प्रभाव रखते हैं। सामान्यत: एक ही रंग के भोज्‍य 

पदार्थों में समान प्रकार के विटामिन प्राप्त होते हैं। उदाहरण के तौर पर पीले व हरे 

प्राकृतिक भोज्य पदार्थ जैसे नीबू, मौसमी आदि विटामिन सी के स्रोत होते हैं। रंग हमें 

सशक्त रूप से प्रभावित करते हैं, हमारे शरीर व मन पर विभन्न कारण से रंगों का प्रभाव 

पड़ता है। ये कारण भौगोलिक, सामाजिक, शिक्षागत अथवा अनुवांशिक हो सकते हैं। यहां 

एक ध्यान देने वाली बात यह भी है कि हमारे शरीर की ग्रंथियों (इंडोसेराइनल सिस्टम) 

का तानाबाना सीधे तौर पर रंगों से प्रभावित होता है। इसका मुख्य कारण यह है कि 

हमको अनुवांशिक रूप से मिले न्यूरो ट्रांसमीटर पिटसवर्ब पेंट कम्पनी ने रंगों पर एक 

प्रयोग के दौरान एक कम्पनी को चुना। कुछ कर्मचारियों के कमरे में रात्रि के दौरान 

दीवारों पर लाल रंग कर दिया गया। शुरुआत के कुछ घंटों में इन कर्मचारियों ने अन्य 

कर्मचारियों की तुलना में दोगुना कार्य किया मगर शाम होते-होते इनमें आपस में झगड़ा 

शुरू हो गया। इस प्रयोग का अध्ययन मनोवैज्ञानिक कर रहे थे। उन्होंने निष्क र्ष निकाला 

कि लाल रंग के अत्यधिक प्रयोग की वजह से रक्तो में एडरेनलिन का स्तर बढ़ गया था

फलस्वंरूप इस प्रकार की घटना हुई। इसके विपरीत पीले, हरे एवं नीले रंगों का प्रयोग 

दवा के तौर पर शांति और दर्द निवारक के रूप में किया जाता है। नारंगी रंग ऊर्जावान 

माना जाता है। नारंगी तथा पीले रंगों का प्रयोग कब्जो दूर करता है, इसके प्रयोग से गुर्दे 

 आदि शुदध होने आरम्भ हो जाते हैं। वस्तु्त: विद्युत चुम्बाकीय इंद्रघनुषी (स्पेथक्ट्ररम) 

का हिस्सा होते हैं ये रंग। इस आक्टेदव शेष हिस्सा कास्मिक किरणें, गामा किरणें, क्ष 

किरणें (एक्स( रे) परा बैगनी किरणें (अल्‍ट्रा वायलेट), इन्फ्राहरेड किरणें, रेडियो किरणें तथा 

हर्टज किरणें होती हैं। ये समस्त किरणें विद्युत चुम्ब्कीय ऊर्जा का ही रूप हैं। इनसे जो 

ऊर्जा उत्‍सर्जित होती हैं उसका विशेष हिस्सा जिसकी तरंग लम्बाई 380 से 760 मिली 

 माइक्रान के बीच होती है उसे हम अपने नेत्रों से देख सकते हैं। सामान्‍य रूप से सभी 

रंग उसी श्रेणी में आते हैं।

दिशा आधारित शाखाओं में उत्तर दिशा हेतु जल तत्व का प्रतिनिधित्व करने वाले रंग 

 नीले और काले माने गए हैं। दक्षिण दिशा हेतु अग्नि तत्व का प्रतिनिधि काष्ठ तत्व है 

जिसका रंग हरा और बैंगनी है। प्रवेश आधारित शाखा में प्रवेश सदा उत्तर से ही माना 

जाता है, भले ही वास्तविक प्रवेश कहीं से भी हो। इसलिए लोग दुविधा में पड़ जाते हैं 

कि रंगों का चयन वास्तु के आधार पर करें या वास्तु और फेंगशुई के अनुसार। यदि 

फेंगशुई का पालन करना हो, तो दुविधा पैदा होती है कि रंग का दिशा के अनुसार चयन 

करें या प्रवेश द्वार के आधार पर। दुविधा से बचने के लिए वास्तु और रंग-चिकित्सा की 

विधि के आधार पर रंगों का चयन करना चाहिए। वास्तु और फेंगशुई दोनों में ही रंगों का 

महत्व है। शुभ रंग भाग्योदय कारक होते हैं और अशुभ रंग भाग्य में कमी करते हैं। 

विभिन्न रंगों को वास्तु के विभिन्न तत्वों का प्रतीक माना जाता है। नीला रंग जल का

भूरा पृथ्वी का और लाल अग्नि का प्रतीक है। वास्तु और फेंगशुई में भी रंगों को पांच 

तत्वों जल, अग्नि, धातु, पृथ्वी और काष्ठ से जोड़ा गया है। इन पांचों तत्वों को अलग-

अलग शाखाओं के रूप में जाना जाता है। इन शाखाओं को मुख्यतः दो प्रकारों में में बाँटा 

जाता है, ‘दिशा आधारित शाखाएंऔर प्रवेश आधारित शाखाएं

सामान्यतः सफेद रंग सुख समृद्धि तथा शांति का प्रतीक है यह मानसिक शांन्ति प्रदान 

करता है। लाल रंग उत्तेजना तथा शक्ति का प्रतीक होता है। यदि पति-पत्नि में परस्पर 

झगड़ा होता हो तथा झगडे की पहल पति की ओर से होती हो तब पति-पत्नि अपने 

शयनकक्ष में लाल, नारंगी, ताम्रवर्ण का अधिपत्य रखें इससे दोनों में सुलह तथा प्रेम 

रहेगा। काला, ग्रे, बादली, कोकाकोला, गहरा हरा आदि रंग नकारात्मक प्रभाव छोडते हैं। 

अतः भवन में दिवारों पर इनका प्रयोग यथा संभव कम करना चाहिये। गुलाबी रंग स्त्री 

सूचक होता है। अतः रसोईघर में, ड्राईंग रूम में, डायनिंग रूम तथा मेकअप रूम में 

गुलाबी रंग का अधिक प्रयोग करना चाहिये। शयन कक्ष में नीला रंग करवायें या नीले 

रंग का बल्व लगवायें नीला रंग अधिक शांतिमय निद्रा प्रदान करता है। विशेष कर 

अनिद्रा के रोगी के लिये तो यह वरदान स्वरूप है। अध्ययन कक्ष में सदा हरा या तोतिया 

रंग का उपयोग करें।


रंग चिकित्सा पद्दति का उपयोग किसी कक्ष के विशेष उद्देश्य और कक्ष की दिशा पर 

निर्भर करती है। रंग चिकित्सा पद्दति का आधार सूर्य के प्रकाश के सात रंग हैं। इन रंगों 

में बहुत सी बीमारियों को दूर करने की शक्ति होती है। इस दृष्टिकोण से उत्तर पूर्वी कक्ष

जिसे घर का सबसे पवित्र कक्ष माना जाता है, में सफेद या बैंगनी रंग का प्रयोग करना 

चाहिए। इसमें अन्य गाढे़ रंगों का प्रयोग कतई नहीं करना चाहिए। दक्षिण-पूर्वी कक्ष में 

पीले या नारंगी रंग का प्रयोग करना चाहिए, जबकि दक्षिण-पश्चिम कक्ष में भूरे, ऑफ 

व्हाइट या भूरा या पीला मिश्रित रंग प्रयोग करना चाहिए। यदि बिस्तर दक्षिण-पूर्वी दिशा 

में हो, तो कमरे में हरे रंग का प्रयोग करना चाहिए। उत्तर पश्चिम कक्ष के लिए सफेद रंग 

को छोड़कर कोई भी रंग चुन सकते हैं। सभी रंगों के अपने सकारात्मक और नकारात्मक 

प्रभाव हैं।

इस प्रकार रंगों का हमारे जीवन व स्वास्थ्य पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। घर की 

 दीवारों पर रंगों का उचित संयोजन करके अपने जीवन को


इसी प्रकार वास्तु या भवन में उत्तर का भाग जल तत्व का माना जाता है। इसे धन यानी 

लक्ष्मी का स्थान भी कहा जाता है। अतः इस स्थान को अत्यंत पवित्र व स्वच्छ रखना 

चाहिए और इसकी साज-सज्जा में हरे रंग का प्रयोग किया जाना चाहिए। कहा जाता हे 

कि रंग नेत्रों के माध्यम से हमारे मानस में प्रविष्ट होते हैं एवं हमारे स्वास्थ्य, चिंतन

आचार-विचार आदि पर इनका गहरा प्रभाव पड़ता है। अतः उचित रंगों का प्रयोग कर हम 

वांछित लाभ पा सकते हैं...


शुभमस्तु !!

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