जय श्री कृष्णः.श्री कृष्ण शरणं मम.श्री कृष्ण शरणं मम.चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः। स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत । तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥ जय श्री कृष्णः

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

दक्षिण का मुख्य द्वार....करें उपचार....




वास्तुशास्त्र में दक्षिण दिशा का द्वार शुभ नहीं माना जाता है। इसे संकट का द्वारा भी कहा जाता है जबकि, पूर्व दिशा को समृद्घि का द्वार कहा जाता है। यही कारण है कि लोग अधिक कीमत देकर भी पूर्व दिशा की ओर मुंह वाला मकान खरीदना पसंद करते हैं और दक्षिण की ओर मुंह वाला घर कम कीमत में भी लेना पसंद नहीं करते हैं।

इस तरह की धारणा का कारण यह है कि लोग वास्तु के नियम को गहराई से समझे बिना अपनी राय बना लेते हैं। वास्तुविद् पं. प्रवीण पुरोहित जी बताते हैं कि दक्षिण दिशा सभी व्यक्ति के लिए अशुभ नहीं होता है। जिन व्यक्तियों का जन्म मेष, धनु अथवा सिंह राशि में हुआ है उनके लिए दक्षिण दिशा का द्वार कष्टकारी नहीं होता है। 



लेकिन जरूरी नहीं कि घर में रहने वाले सभी व्यक्तियों की राशि इन्हीं तीन में से एक हो। इसलिए दक्षिण दिशा के द्वार के अशुभ प्रभाव को लेकर किसी भी प्रकार की आशंका हो तो वास्तु दोष दूर करने के कुछ सामान्य से उपाय को आजमाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख्य द्वार वाले घर में भी सुख पूर्वक रहा जा सकता है। 

वास्तु उपाय....

द्वार के ठीक सामने एक आदमकद दर्पण इस प्रकार लगाएं जिससे घर में प्रवेश करने वाले व्यक्ति का पूरा प्रतिबिंब दर्पण में बने। इससे घर में प्रवेश करने वाले व्यक्ति के साथ घर में प्रवेश करने वाली नकारात्मक उर्जा पलटकर वापस चली जाती है। द्वार के ठीक सामने आशीर्वाद मुद्रा में हनुमान जी की मूर्ति अथवा तस्वीर लगाने से भी दक्षिण दिशा की ओर मुख्य द्वार का वास्तुदोष दूर होता है। मुख्य द्वार के ऊपर पंचधातु का पिरामिड लगवाने से भी वास्तुदोष समाप्त होता।  

जो लोग घर बनावा रहे हों और उनके भवन का मुख्यद्वार दक्षिण दिशा के अलावा अन्य दिशा में नहीं हो सकता है तब दक्षिण दिशा के वास्तु को दूर करने के लिए गृह निर्माण के समय ही वास्तु उपाय कर लेना चाहिए। इसके लिए सबसे सरल उपाय यह है कि दक्षिण पूर्व से एक तिहाई भाग छोड़कर मुख्य द्वार का निर्माण करवायें। 


शुभमस्तु !!

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