जय श्री कृष्णः.श्री कृष्ण शरणं मम.श्री कृष्ण शरणं मम.चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः। स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत । तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥ जय श्री कृष्णः

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

जन्मकुंडली द्वारा इष्टदेव की पूजा कर लाभ उठायें.......




यदि पंचम भाव में पुरुष ग्रह तो देवता की आराधना करनी चाहिए । 

तथा स्त्री ग्रह हो तो देवी की आराधना करनी चाहिए ।

१-पचम भाव में सूर्य हो तो जातक को सूर्य या शिव जी की उपासना करना चाहिए ।

२-पचम भाव में चन्द्रमा या शुक्र हो तो जातक को गौरी या लक्ष्मी की उपासना करना चाहिए ।


३-पचम भाव में मंगल हो तो जातक को गणेश , कार्तिकेय या हनुमान जी उपासना करना चाहिए ।



४-पचम भाव में बुध हो तो जातक को राम , कृष्ण या विष्णु जी की उपासना करना चाहिए ।

५ -पचम भाव में गुरु हो तो जातक को शिव जी की उपासना करना चाहिए ।

६-पचम भाव में शनि, राहू, केतु हो तो जातक को भैरव या क्षुद्र देवता की उपासना करना चाहिए ।

७ - यदि पंचमेश { पचम भाव का स्वामी } लग्नेश का मित्र हो तो उपरोक्त देवता की आराधना से

 कार्य परिपूर्ण होगा ।




इसके अलावा अपने लग्न के अनुसार भी अपने ईष्ट देव जान सकते है...

1.मेष लग्न सूर्य,दत्तात्रेय , गणेश

2.
वृषभ- कुलदेव ,शनि

3.
मिथुन-कुलदेव , कुबेर

4.
कर्क- शिव, गणेश

5.
सिंह- सूर्य

6.
कन्या- कुलदेव

7.
तुला- कुलदेवी

8.
वृश्चिक- गणेश

9.
धनु- सूर्य ,गणेश

10.
मकर - कुबेर,हनुमंत,कुलदेव,शनि

11.
कुम्भ- शनि, कुलदेवी,हनुमान

12.
मीन- दत्तात्रेय,शिव,गणेश



यदि जन्मकुंडली में निम्न बली ग्रह हो........

.......
सूर्य तो व्यक्ति शक्ति उपासना कर अभीष्ट पाता है,

चंद्र हो तो तामसी साधनों में रूचि रखता है,

मंगल हो शिव उपासना,

बुध हो तो तंत्र साधना में,

गुरु हो तो साकार ब्रह्मोपासना में,

शुक्र हो तो मंत्र साधना में,

शनि हो तो मन्त्र तंत्र में निष्णात व विख्यात होता है.

इसी प्रकार जन्म कुंडली के भावों का भी विचार करें....

............
प्रथम भाव या चंद्रमा पर शनि की दृष्टि हो तो जातक सफल साधक होता है.

चंद्रमा नवम भाव में किसी भी ग्रह की दृष्टि से रहित हो तो व्यक्ति श्रेष्ट सन्यासी होता है.

दशम भाव का स्वामी सातवे घर में हो तो तांत्रिक साधना में सफलता मिलती है

नवमेश यदि बलवान होकर गुरु या शुक्र के साथ हो तो सफलता मिलती ही है.

दशमेश दो शुभ ग्रहों के मध्य हो तब भी सफलता प्राप्त होती है .

यदि सभी ग्रह चंद्रमा और ब्रहस्पति के मध्य हो तो तंत्र के बजाय मंत्र साधना ज्यादा अनुकूल रहती है .

केन्द्र या त्रिकोण में सभी ग्रह हो तो प्रयत्न करने पर सफलता मिलती ही है.

गुरु, मंगल और बुध का सम्बन्ध बनता हो तो सफलता मिलती है .

शुक्र व बुध नवम भाव में हो तो ब्रह्म साक्षात्कार होता है.

सूर्य उच्च का होकर लग्न के स्वामी के साथ हो तो व्यक्ति श्रेष्ट साधक होता है .

लग्न के स्वामी पर गुरु की दृष्टि हो तो मन्त्र मर्मज्ञ होता है

दशम भाव का स्वामी दशम में ही हो तो साकार साधनों में सफलता मिलती है.

दशमेश शनि के साथ हो तो तामसी साधनों में सफलता मिलती है.

राहु अष्टम का हो तो व्यक्ति अद्भुत व गोपनीय तंत्र में प्रयत्नपूर्वक सफलता पा सकता है.

पंचम भाव से सूर्य का सम्बन्ध बन रहा हो तो शक्ति साधना में सफलता मिलती है.

नवम भाव में मंगल का सम्बन्ध तो शिवाराधक होकर सफलता पाता है.

नवम में शनि स्वराशि स्थित हो तो वृद्धावस्था में व्यक्ति प्रसिद्द सन्यासी बनता है.


इस प्रकार सभी को विचार करके अपने ईष्ट देव जी का चयन करें तत्पश्चात उनकी आराधना करने से लाभ प्राप्त करें..




शुभमस्तु!!!












2 टिप्‍पणियां:

  1. sharma ji pranam dob 25 march 1980 21:30 hardoi up baba bhole hamare araday hai manday sut. Ko 7 bar hanuman chalisa ka path karte hai apne bicharo se anugit kare aap ka ram mishra shahjahanpur

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    1. बहुत अच्छा है ऐसा ही करें श्री हनुमान जी भगवान् शिव के ही गण / रूप है

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