जय श्री कृष्णः.श्री कृष्ण शरणं मम.श्री कृष्ण शरणं मम.चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः। स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत । तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥ जय श्री कृष्णः

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

होरा चक्र का दैनिक उपयोग.....



भारतीय ज्योतिष में होरा चक्र का बहुत महत्व है..

ज्योतिष ग्रंथों में वर्णन निम्न  श्लोक द्वारा लिखित भी है..

"अर्थार्जने सहाय:पुरुषाणामापदर्णवे पोत:,
यात्रा समये मन्त्री जातकमहापाय नास्त्यपर:" ॥ 
                     ..................सारावली 

अर्थात:- मनुष्यों को धन अर्जित करने मे यह (होरा शास्त्र) सहायता करता है, (शुभ दशा में लाभ,और अशुभ दशा मे हानि),विपत्ति रूपी समुद्र में नौका या जहाज का कार्य करता है,एवं यात्रा के समय में मंत्री अर्थात उत्तम सलाहकार होरा शास्त्र को छोड कर अन्य कोई नहीं हो सकता है.


"यस्य ग्रहस्य वारे यत्किंचित्कर्म प्रकीर्तित:। 

तत्तस्य काल होरायां सर्वमेव विधीयते।।"


महर्षियों ने कहा है कि जो काम जिस वार में करना विहित है, उसे उसके काल होरा में करें। कार्य 

जिस नक्षत्र में विहित है, वह उस नक्षत्र के स्वामी के मुहूर्त में करें।



जिस दिन और जिस समय जातक ने प्रश्न किया है उस दिन की होरा ज्ञात करेंगें. होरा जानने के बाद यह तय करेंगें कि प्रश्न के समय किस ग्रह की होरा चल रही थी. जिस ग्रह की होरा चल रही थी उस ग्रह से संबंधित बातों का विश्लेषण प्रश्न कुण्डली में किया जाता है. इससे भी प्रश्न की पहचान करने में सहायता मिलति है. प्रश्न के स्वरुप के बारे में जानकारी मिलती है.              


 जिस दिन जातक ने प्रश्न किया है उस दिन का सूर्योदय देखें कि कितने बजे हुआ है. उसे नोट कर लें. सूर्योदय से सूर्यास्त तक के 1-1 घण्टे के 12 हिस्से बनेगें. सूर्यास्त से सूर्योदय तक 12 हिस्से बनेंगें. इस प्रकार 24 होरा प्राप्त होगीं. जिस दिन की होरा जाननी है उस दिन की पहली होरा वार स्वामी की होगी और अगली होरा वार स्वामी से छठे वार की होगी. फिर अगली होरा उससे छठे वार स्वामी की होगी. इस तरह से 24 होराओं का क्रम बन जाएगा. आइए इसे उदाहरण से समझें. 

माना प्रश्न के दिन के समय सोमवार था और सूर्योदय सुबह 6 बजे होता है तो 6 से 7 बजे तक चन्द्रमा की होरा होगी. 7 से 8 बजे तक चन्द्रमा से छठे वार के स्वामी की होगी. चन्द्रमा से छठे वार का स्वामी शनि होता है. इस प्रकार बकी होरा भी क्रम से होगीं. आइए इसे तालिका से समझें. 

सुबह 6 से 7 चन्द्रमा की होरा
7 से 8 शनि की होरा
8 से 9 गुरु की होरा
9 से 10 मंगल की होरा
10 से 11 सूर्य की होरा
11 से 12 शुक्र की होरा
12 से 1 बुध की होरा
1 से 2 चन्द्रमा की होरा  
2 से 3 शनि की होरा
3 से 4 गुरु की होरा 
4 से 5 मंगल की होरा
5 से 6 सूर्य की होरा 
6 से 7 शुक्र की होरा ......इसी प्रकार आगे देखें.

जब आप होरा का निर्धारण करते हैं तब एक बात पर आप गौर करें कि होरा का क्रम ग्रहों के आकार के क्रम पर स्वत: ही निर्धारित हो जाता है. जैसे आप गुरु को देखें कि वह आकार में सबसे बडा़ ग्रह है. उसके बाद होरा स्वामी मंगल होता है. मंगल के बाद शनि और इस तरह से सभी ग्रह क्रम से अपने आकार के अनुसार चलते हैं. होरा स्वामी दो समूहों में बांटे गए हैं. पहले समूह में बुध, शुक्र तथा शनि आते हैं. दूसरे समूह में सूर्य, चन्द्रमा, मंगल तथा गुरु आते हैं. जब होरा का समूह प्रश्न के समय बदल रहा हो तब प्रश्न से संबंधित कोई मुख्य बदलाव हो सकते हैं.  
इस तरह से आप देखें कि प्रश्न के समय किस ग्रह की होरा चल रही है. जिस ग्रह की होरा चल रही है प्रश्नकर्त्ता का प्रश्न उस ग्रह से संबंधित हो सकता है. यदि होरेश अर्थात होरा स्वामी पीड़ित है तब कार्य सिद्धि में अड़चन आ सकती हैं.  

जिस होरा में प्रश्न आता है उसके आप तीन बराबर भाग कर दें. एक होरा एक घण्टे की होती है. एक घण्टे को तीन बराबर भागों में बाँटे. प्रश्न का सही समय देखें कि कौन से भाग में आ रहा है. यदि प्रश्न होरा के पहले भाग में आ रहा है तो इसका अर्थ है प्रश्नकर्त्ता की समस्या अभी आरम्भ हुई है. यदि होरा के दूसरे भाग में आ रहा है तो समस्या अभी और चल सकती है. यदि होरा के तीसरे भाग में प्रश्न  आ रहा है तो इसका अर्थ है कि समस्या समाप्त होने वाली है. 




होरा का प्रयोग प्रश्न की पहचान करने में किया जाता है. प्रश्न का निर्णय करने में कि होरा स्वामी किस स्थिति में है. प्रश्न की धातु, मूल तथा जीव चिन्ता के निर्धारण में भी होरा का प्रयोग किया जाता है. 



शुभमस्तु !!

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