जय श्री कृष्णः.श्री कृष्ण शरणं मम.श्री कृष्ण शरणं मम.चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः। स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत । तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥ जय श्री कृष्णः

शनिवार, 1 जून 2013

रुद्राक्ष का चमत्कार.....1




रुद्राक्ष का परिचय रुद्राक्ष वह अद्भुत वस्तु है जिसे करूणा के सागर, संसार को विष की ज्वाला से बचाने वाले, उत्पत्ति-पालन-विनाश के कर्ता  भगवान शिव स्वयं धारण करते हैं। रुद्राक्ष का अर्थ है - रूद्र का अक्ष अर्थात शिव के आंसू. अर्थात रुद्राक्ष शिव स्वरूप ही है। रुद्राक्ष मानव के लिये अपने अंतर्मन में गहराईयों तक जाने का स्रोत है। इसे पृथ्वी व स्वर्ग के बीच का सेतु माना जाता है। भारत के प्राचीन ग्रंथों व पुराणों में रुद्राक्ष का वर्णन बखूबी मिलता है जैसे कि शिवमहापुराण, निर्णयसिंधु, लिंगपुराण, पद्मपुराण, मंत्रमहार्णव, महाकाल संहिता, रुद्राक्षजाबालोपनिषद, वृहज्जाबालोपनिषद्, और सर्वोल्लासतंत्र में रुद्राक्ष के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है।

एक समय भारतवर्ष में रुद्राक्ष का बहुत प्रचलन था। सभी छोटे-बड़े व्यक्ति रुद्राक्ष की माला अवश्य पहनते थे। परंतु अंग्रेजों के आने के बाद रुद्राक्ष का महत्त्व कम हो गया क्योंकि अंग्रेज लोग रुद्राक्ष पहनने वाले लोगों को असभ्य व जंगली कहते थे। धीरे धीरे लोग भी रुद्राक्ष के गुणों को भूल कर इसका प्रयोग कम करने लगे। 
रुद्राक्ष दरअसल भूरे रंग के दाने होते हैं जो कि रुद्राक्ष नामक फल के बीज होते हैं। यह फल रुद्राक्ष के पेड़ पर लगता है। जीव विज्ञान में रुद्राक्ष के पेड को ‘‘उतरासम बीड ट्री’’ कहा जाता है। इसके पत्ते हरे रंग के होते हैं। फल भूरे रंग का और स्वाद कसैला होता है। रुद्राक्ष वृक्ष अधिकतर इंडोनेशीया, नेपाल, भारत, जावा, सुमात्रा, बाली और ईरान, में पाये जाते हैं। एक अनुमान के अनुसार लगभग 65 प्रतिशत रुद्राक्ष वृक्ष इंडोनेषिया में, 25 प्रतिशत नेपाल में और प्रतिशत भारत में पाये जाते हैं।
  
ये रत्नों की तरह से हानि नहीं पंहुचाते क्योंकि रुद्राक्ष कभी भी ऋणात्मक ऊर्जा उत्सर्जित नहीं करते। रत्नों को तो किसी सुयोग्य ज्योतिषी से ही सलाह लेकर पहना जा सकता है क्योंकि गलत रत्न पहनने से लाभ की जगह हानि भी हो सकती है जबकि आमतौर पर रुद्राक्ष को कोई भी व्यक्ति कभी भी धारण कर सकता है। किसी भी रत्न की माला से रुद्राक्ष माला अधिक पवित्र, शुभ  व शक्तिषाली होती है। रुद्राक्ष की कार्यप्रणाली प्रत्येक इंसान की अपनी अपनी ‘‘ओरा’’ (ऊर्जा क्षेत्र) होती है जो उसके शरीर के चारो ओर 2 से 4 इंच तक की परिधि में रहती है। यह इंसान की आत्मिक ऊर्जा को दर्षाती है। यह अपने अंदर इंद्रधनुष के सभी रंग समेटे होती है। यही ऊर्जा व रंग ही इंसान के स्वभाव, गरिमा, मानसिक स्थिति, भावनाओं, इच्छाओं आदि के बारे में संकेत देते हैं। यह ओरा अंगुठे की छाप की तरह होती है जो कि प्रत्येक इंसान की अपनी अलग होती है और यह बताती है कि इंसान अपने आप में पूर्ण रूप से क्या है। यह माना जाता है और अब तो सिद्ध भी हो गया है कि रुद्राक्ष की अपनी कुछ खास चुंबकीय और विद्युतीय तरंगें होती हैं। जब कोई व्यक्ति रुद्राक्ष को दिल के पास पहनता है तो उसमें से कुछ विशेष  रश्मिया  या किरणें निकलती हैं जिनकी गुणवत्ता रुद्राक्ष के मुखों के अनुसार होती हैं। ये किरणें ही उस व्यक्ति के दिमाग के तंतुओं और कोषिकाओं को प्रभावित कर उसकी ओरा को पवित्र और शुद्ध रखने में मदद करती हैं। मेडिकल सांइस में भी यह बात सिद्ध हो चुकी है.

रुद्राक्ष को किसी धातु विषेष जैसे कि सोने, चांदी या ताम्बे  के साथ भी पहना जा सकता है जो कि रुद्राक्ष की चुंबकीय व विद्युतीय गुणों को और अधिक बढा सकते हैं। गुणवत्ता की जांच रुद्राक्ष के पानी में डूबने या तैरने की विधि भी प्रामाणिक जांच नहीं है। सबसे अच्छा जांच का तरीका तो अनुभव ही है और कौशिश करें कि वहां से लें जहां पर भरोसा हो। एक अन्य तरीका है कि रुद्राक्ष को यदि यह असली रुद्राक्ष है तो इसका कुछ भी नहीं बिगडेगा और यदि यह नकली रुद्राक्ष है तो इसमें दरारें पड़ जायेंगी, इसका रंग उतर जायेगा, इसका आकार बदल जायेगा या यह बदबू देने लगेगा। रुद्राक्ष से संबंधित कुछ सावधानियां रुद्राक्ष सामान्य रूप से किसी भी व्यक्ति को स्वास्थ्य, शान्ति  व समृद्धि देता है. हालांकि रुद्राक्ष की शक्ति किसी भी रत्न, यंत्र, तंत्र या मंत्र से अधिक है फिर भी रुद्राक्ष धारक को रुद्राक्ष की शक्ति और पवित्रता बनाये रखने के लिये कुछ नियम मानने चाहियें जो कि इस प्रकार हैं: रुद्राक्ष को किसी शुभ  मुहुर्त में सोमवार या गुरूवार को पहनना चाहिये  रुद्राक्ष को धारण करने से पहले दूध, घी, तेल आदि से धोकर साफ व शुद्ध करना चाहिये। तत्पष्चात् रुद्राक्ष के मुख संख्या के अनुसार मंत्रों से जाप कर रुद्राक्ष को ऊर्जा देनी चाहिये व कार्यशील बनाना चाहिये। रोजाना सुबह नहाने के पश्चात् पूर्व दिशा की ओर मुख कर रुद्राक्ष मंत्रों का 9 बार जाप करके और रुद्राक्ष को घूप-दीप दिखाकर पहनना चाहिये। यही प्रक्रिया सोने से पहले भी दोहरानी चाहिये और सोने से पहले रुद्राक्ष को उतार कर पूजा स्थल पर रख देना चाहिये। रुद्राक्ष धारक को मांसाहारी भोजन व मदिरा सेवन नहीं करना चाहिये। उसे हमेशा सच बोलना चाहिये व रोजाना भगवान शिव के मंदिर में उनके आशीर्वाद के लिये जाना चाहिये। अशुभ स्थानों जैसे कि शमशान आदि पर रुद्राक्ष को नहीं ले जाना चाहिये। 

रुद्राक्ष को उस स्थान पर भी नहीं ले जाना चाहिये जहां किसी बच्चे ने जन्म लिया हो। स्नान व शौचालय के समय भी रुद्राक्ष को धारण नहीं करना चाहिये। साबुन रुद्राक्ष के गुणों को प्रभावित करता है। स्त्री प्रसंग के समय भी रुद्राक्ष को उतार देना चाहिये। यदि रुद्राक्ष धारक स्त्री है तो उसे अपने महावारी के दिनों में रुद्राक्ष को उतार देना चाहिये। रुद्राक्ष को हमेशा साफ रखना चाहिये। धूल और मिटटी रुद्राक्ष के दानों के छिद्रों में जमा हो सकती है। उसे तुरंत किसी ब्रश आदि से साफ कर देना चाहिये। तत्पश्चात गंगाजल से धो लेना चाहिये। रुद्राक्ष को तेल से भी धोना चाहिये और धूप आदि भी दिखाना चाहिये, विषेषकर उन दिनों में जब रुद्राक्ष कुछ समय के लिये प्रयोग में नहीं लिया जा रहा है। जो लोग त्वचा रोग के कारण किसी तरह की माला आदि नहीं पहन सकते, उन्हें रुद्राक्ष को पूजा स्थल पर रख कर पूजा-नमस्कार आदि करना चाहिये। रुद्राक्ष माला किसी अन्य व्यक्ति से बदलनी नहीं चाहिये। रुद्राक्ष पहनने के 40 दिन के बाद व्यक्ति को अपने अंदर व अपने व्यवहार में बदलाव महसूस होने लगता है। विभिन्न प्रकार के रुद्राक्ष एवं उनके लाभ विभिन्न प्रकार के रुद्राक्ष उनकी ‘‘मुख संख्या’’ के अनुसार जाने जाते हैं। रुद्राक्ष के दानों यानि मनकों पर कुछ धारियां सी होती हैं जिन्हें ‘‘मुख’’ कहा जाता है. इन्हीं मुखों के सहारे ही रुद्राक्ष की गुणवत्ता भी जांची जाती है। इन्हीं धारियों या मुखों के अनुसार ही रुद्राक्ष एक मुखी से बहुमुखी कहे जाते हैं। 

शास्त्रों में 1 से 32 मुखी तक के रुद्राक्ष की बात की गई है लेकिन ज्योतिषीय दृष्टि से 1 से 14 मुखी तक के रुद्राक्ष ही उपयोग में लाये जाते हैं। 32 मुखी तक के रुद्राक्ष आसानी से मिलते भी नहीं हैं। केवल 14 मुखी तक के रुद्राक्ष ही आसानी से मिल पाते हैं. कभी कभी 16 या 18 मुखी रुद्राक्ष भी उपलब्ध हो जाता है। 


शेष अगले भाग में......




शुभमस्तु !!

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