जय श्री कृष्णः.श्री कृष्ण शरणं मम.श्री कृष्ण शरणं मम.चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः। स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत । तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥ जय श्री कृष्णः

रविवार, 2 जून 2013

भगवान् सूर्य के व्रत द्वारा अपनी कामनायें पूर्ण करें......




वार व्रत का महत्व श्रुति, स्मृति एवं पुराणों में विशिष्टता के साथ वर्णित है। सप्ताह के प्रत्येक वार का काल सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक रहता है। श्रेष्ठता के अनुसार भी व्रत रखने के लिए वार का क्षय नहीं होता है, किंतु तिथि- नक्षत्र का क्षय अवश्य होता रहता है।
सूर्यादि ग्रहों के नामों के अनुसार ही वारों का नामकरण हुआ- 
सूर्य से रविवार, चंद्र से सोमवार, मंगल से मंगलवार, बुध से बुधवार, गुरु से गुरुवार, शुक्र से शुक्रवार और शनि से शनिवार। 
किसी ग्रह की अनुकूलता प्राप्त करने हेतु उससे संबंधित वस्तुओं का दान, जप तथा व्रत करने का विधान है। किसी ग्रह की शांति कराने या उसकी शुभता प्राप्त करने के लिए उससे संबंधित वार को व्रत किया जाता है। 
यदि किसी ग्रह की दशा, महादशा, अंतर्दशा, जन्मांक और गोचराष्टक वर्ग में से कोई अनिष्टकारी हो तो उस ग्रह की शांति के लिए वार के अनुसार व्रत करने का विधान है। 
यहां हम रविवार के व्रत जो कि भगवान सूर्य का व्रत है उसका विधानपूर्वक वर्णन कर रहे हैं।

 रविवार व्रत विधान......
यह व्रत सूर्य देव की कृपा प्राप्ति हेतु किया जाता है। सूर्य प्रकाश, आरोग्य, प्रतिष्ठादि देते हैं तथा अरिष्टों का निवारण भी करते हैं।
 नवग्रह शांति विधान में भी केवल सूर्योपासना से सभी ग्रह की शांति हो जाती है, क्योंकि ये नवग्रहों के राजा हैं। इस हेतु माह वैशाख, मार्गशीर्ष और माघ श्रेष्ठ हैं। उक्त में से किसी भी माह के प्रथम रविवार से इस व्रत को संकल्प लेकर प्रारंभ करना चाहिए। शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार से भी व्रत प्रारंभ किया जा सकता है। 
प्रत्येक माह में सूर्य के अलग-अलग नामों से व्रत-पूजन करन का विधान है। 
चैत्र: इस माह के व्रत में भानु नाम से सूर्य की पूजा होती है जिसमें घी, पूड़ी, मिष्टान्न, दूध आदि के भोग लगाने का विधान है। 
वैशाख: इस माह के व्रत में तपन नाम से सूर्य की पूजा करते हैं और उड़द, घी, गोबर के प्राशन व दाख के अघ्र्य देने का विधान है। 
ज्येष्ठ: इसमें सूर्य की पूजा इंद्र के नाम से करते हैं। इसमें दही, सत्तू और आम का अघ्र्य देकर चावल आदि के दान का विधान है। 
आषाढ़: इस माह में सूर्य की सूर्य नाम से पूजा कर जायफल, चिउड़ा आदि का अर्घ्य देते हैं। 
श्रावण: इस माह में गभस्तिनाम से सत्तू, पूड़ी, फल आदि से पूजा की जाती है। 
भाद्रपद: इस माह में यंत्र नाम से पूजा करते हैं तथा घी, भात, कूष्मांड़ आदि का अघ्र्य देते हैं।
 अश्विन: हिरण्यरेता नाम से सूर्य की आराधना की जाती है। इसमें शर्करा, दाड़िम आदि का अघ्र्य देते हुए चावल और चीनी से पूजा करते हैं। 
कार्तिक: दिवाकर नाम से सूर्य की पूजा करते हैं और खीर और केले का अघ्र्य देकर खीर का भोजन अर्पित करते हैं। 
मार्गशीर्ष: इस माह में मित्रनाम से सूर्य पूजा का विधान है। इसमें चावल, घी, गुड़ और नारियल का अघ्र्य दिया जाता है। 
पौष: विष्णु नाम से सूर्य की उपासना करते हुए चावल, मूंग, तिल खिचड़ी, और बिजौरी का अघ्र्य देते हैं। 
माघ: वरुण नाम से सूर्य की पूजा का विधान है। इसमें तिलों का अघ्र्य तथा तिल और गुड़ का प्रसाद अर्पित किया जाता है। साथ ही गुड़ के दान का भी विधान है। 
फाल्गुन: पुनः भानु नाम से सूर्य की पूजा करते हुए दही और घी का नैवेद्य और जंभीरी का अघ्र्य देते हैं। इस व्रत में इलायची मिश्रित गुड़ का हलवा, गेहूं की रोटियां या गुड़ से निर्मित दलिया सूर्यास्त के पूर्व भोजन के रूप में ग्रहण करना चाहिए। 
भोजन में सर्वप्रथम सात कौर गुड़ का हलवा या दलिया और फिर अन्य पदार्थ ग्रहण करना चाहिए। 
भोजन के पूर्व हलवा या दलिया का कुछ भाग देवालय के समक्ष उपस्थित भिखारियों को या देव-दर्शन को आए बालक-बालिकाओं को देना चाहिए। 
प्रातः काल स्नानोपरांत रोली या लाल चंदन, लाल पुष्प, अक्षत, दूर्वा मिश्रित जल आदि से सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए। 
भोजन के पूर्व स्नान आदि से निवृति होकर शुद्ध वस्त्र धारण कर निम्न मंत्र बोलते हुए पुनः अर्घ्य दें. 
"नमः सहस्रांशु सर्वव्याधि विनाशन/गृहाणाघ्र्यमया दत्तं संज्ञा सहितो रवि।।" 
अघ्र्य देने के पूर्व ‘ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमःमंत्र का कम से कम पांच माला जप करना चाहिए। 
लाल चंदन, कुमकुम या रोली का तिलक लगाकर रविवार व्रत कथा पढ़ें। 
अंतिम रविवार को आम या अर्क की समिधा से हवन कर ब्राह्मण व ब्राह्मणी को भोजन कराएं और वस्त्र, दक्षिणा आदि देकर आशीर्वाद लें। 
ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए पूर्ण निष्ठा के साथ सूर्य का व्रत करने से सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। 
साथ ही नेत्र व्याधि, चर्म रोग, कुष्ठ रोगादि दूर होते हैं। यह व्रत आरोग्य, सौभाग्य और दीर्घायु भी देता है। 




शुभमस्तु !!

1 टिप्पणी:

  1. Dob 74.1979 tob 5.20 pm pob amritsar hai. Pt ji mera divorce ho chuka hai. Second marrige ka yog kb tk hai.kb hogi shafi. Or kya meri married life successes hogi ya nahi. Kyuki muje ek bar kisi pr ji ne bataya tha. K tumahri pahli shafi alsp au hogi. Dusri b aise ho jogi. Or uske baf kucj nahi bbataya. Kya dusri bar b mete sath kuch aaisa hi hoga..ya

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