श्री कृष्ण शरणम ममः

श्री कृष्ण शरणम ममः
ॐ चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः। स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत । तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥

प्रेम सम्बन्ध में विफलता ..हस्त रेखाएं व उपाय.




किसी शायर ने सच ही कहा है.......
 
‘‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता

कभी जमीं तो कभी आसमां नहीं मिलता’’


सफल प्रेम संबंध को व्यक्ति के खुशहाल जीवन की ओर पहला कदम समझा जाता है. प्राय: देखा जाता है कि वे लोग जो अपने साथी को लेकर पूरी तरह आश्वस्त और अपने संबंध के भविष्य के प्रति निश्चिंत रहते हैं वह उन लोगों की तुलना में ज्यादा प्रसन्न रहते हैं जिनका प्रेम संबंध बहुत बुरे दौर से गुजर रहा है. यही कारण है कि जहां एक खुशहाल प्रेम संबंध आपके लिए खुशहाली और सफलता के रास्ते खोल देता है वहीं एक बुरा अनुभव आपके व्यक्तित्व को इस कदर चोट पहुंचाता है कि आपको खुद को संभालने में ही काफी समय लग जाता है. हालांकि प्रेम-प्रसंग हमेशा ही समस्याओं और विवादों के साये में घिरा रहता है लेकिन जब यह समस्याएं आपकी खुशियों और स्वाभिमान को आहत करने लगें तो ऐसे संबंधों से पीछे हट जाना ही बेहतर विकल्प है. आपके संबंध का भविष्य स्थायी है या नहीं इसे आपको खुद ही निर्धारित करना पड़ता है. आज हस्त रेखा द्वारा इस विषय को समझते है..

यह जिंदगी की हकीकत मनुष्य के जीवन के हर पहलू पर लागू होती है। प्रेम-संबंधों के मामले में भी इसकी अहमियत कम नहीं है। 

क्या आपने कभी सोचा है, ऐसा क्यूं होता है
जब कोई लड़का-लड़की या स्त्री-पुरुष गहरे प्रेम में होते हैं और आपसी संबंधों को नाम देने की सोचते भी हैं तो वक्त और हालात के कारण कभी-कभी अलग-अलग हो जाते हैं । फिर सारी जिंदगी इस बात का जवाब नहीं मिल पाता है कि हमारे साथ ही ऐसा क्यूं हुआ?


लेकिन, सामान्यतः लोग हालात को ही सबसे दोषी ठहराते हैं। दरअसल, इसका सबसे बड़ा कारण हाथों की रेखाओं में दोष और ग्रहों का दुष्प्रभाव होता है। प्रेम करने वाले कई जातकों के हाथों का अध्ययन बताता है कि....

यदि - भाग्य रेखा पर द्वीप हो, शुक्र पर्वत उठा हो, शुक्र पर्वत पर तिल हो तो भी प्रेम-संबंध बिगड़ जाते हैं। ऐसे जातकों के प्रेम को इनके परिवार के सदस्य समझ ही नहीं पाते हैं और इनके संबंधों को हमेशा अनुचित मानते हैं। ऐसी स्थिति में कई बार परिवार में कलह भी होता है। यह भी सच है कि ऐसे कुछ व्यक्ति ही अपने रिश्तों को अंजाम तक पहुंचा पाते हैं। उपाय:- इस प्रकार के दोष को रोकने के लिए शुद्ध पारे के शिवलिंग की आराधना शिव रुद्राष्टकम् पढ़कर करनी चाहिए।

हृदय रेखा टूटी-फूटी हो या हृदय रेखा पर द्वीप हो, जीवन रेखा को मोटी-मोटी रेखाएं काटती हों, शुक्र पर्वत व चंद्र पर्वत अत्यधिक विकसित हों तथा भाग्य रेखा जीवन रेखा के साथ हो तो जातक को अपना मनपसंद जीवन साथी नहीं मिल पाता है। उपाय:- इस दोष को दूर करने के लिए शिव पार्वती का चित्र स्थापित करें, जोत जलाकर पारे के शिवलिंग का स्पर्श करें व शिव मंत्र का जाप करें।

हृदय रेखा से शाखाएं मस्तिष्क रेखा में मिलती हों, मस्तिष्क रेखा चंद्र पर्वत पर जाती हो, शुक्र पर्वत पर अधिक रेखाएं हों, गुरु की अंगुली सूर्य की अंगुली से छोटी हो तथा हाथ मध्यम श्रेणी का हो तो जातक का प्रेम-संबंध अक्सर बिगड़ जाता है। उपाय:- इस दोष को दूर करने के लिए पारे की माला पहननी चाहिए व शिव-पार्वती की आराधना मंत्र उच्चारण के साथ करनी चाहिए।

हाथ का रंग काला हो, हृदय रेखा का अंत सीधे गुरु पर्व के नीचे हो, हाथ में रेखाएं कम व हाथ सख्त हो तो परिवार के सदस्य ऐसे जातकों के प्रेम को बढ़ने नहीं देते हैं और प्रेमी-प्रेमिका में भी अक्सर झगड़ा ही होता रहता है। उपाय:- यह दोष हाथ में बहुत ही बुरा माना जाता है। इसके लिए नव ग्रह-पूजन व पारे के शिवलिंग की विधिवत पूजा करने से ही राहत मिल सकती है।

हाथ सख्त हों व अंगुलियां अंगूठे के की तरफ हों  तो भी जातक के जीवन में प्रत्येक संबंध को लेकर खट-पट चलती रहती है। उपाय:- रोजाना नव ग्रहों का जाप व पारे से बनी किसी देवी की मूर्ति की आराधना विधिपूर्वक करने से इस दोष से निजात मिलती है।

भाग्य रेखा व हृदय रेखा मोटी हो, गुरु की अंगुली छोटी, मस्तिष्क रेखा का अंत चंद्र पर्वत पर, हाथ सख्त व काला हो तो ऐसे लोगों की बात-बात में झगड़ने की आदत के कारण संबंध टूट जाते हैं। उपाय:- ऐसे जातकों को मंगल यंत्र की स्थापना के साथ-साथ पारे के शिवलिंग की पूजा करनी चाहिए।

शनि की अंगुली व बुध की अंगुली तिरछी हों, मंगल ग्रह और बुध ग्रह पर रेखाओं का जाल अधिक हो तो भी प्रेम संबंधों में कई प्रकार की रुकावटें आती हैं। उपाय:- इस दोष को दूर करने के लिए शनि ग्रह का उपाय दान करें व छल्ला धारण करने के साथ पारे के शिवलिंग की पूजा करनी चाहिए।

हृदय रेखा से शाखाएं नीचे की तरफ गिरती हों, भाग्य रेखा टूटी-फूटी या मोटी पतली हो, मंगल क्षेत्र पर मोटी रेखाएं हों, गुरु पर्वत व बुध पर्वत दबे हों तो भी प्रेम-संबंध अक्सर बिगड़ते ही पाये गये हैं। उपाय:- इस दोष की पूर्ति के लिए पारे की माला व पारे के शिवलिंग की पूजा करनी चाहिए व नित्य सूर्य व चंद्र को अर्घ्य भी देना चाहिए।

इस प्रकार, हाथ में कोई दोष नजर आए तो उनका उपाय करके व्यक्ति अपने जीवन को सुखमय बना सकता है।

 शुभमस्तु !!

रुद्राक्ष का चमत्कार .....3



रुद्राक्ष की माला रुद्राक्ष को एक अकेले दाने के रूप में या माला के रूप में भी धारण किया जा सकता है। एक ही माला के सभी दाने एक ही प्रकार के भी हो सकते हैं और विभिन्न प्रकार के भी हो सकते हैं। रुद्राक्ष की माला अनेक प्रकार से फलदायिनी होती है। इसमें गुण ही गुण होते हैं तथा इसमें कोई अवगुण नहीं पाया जाता। रुद्राक्ष की माला पर जप करने से अनेक रोगों का इलाज किया जा सकता है। रुद्राक्ष की माला पर किसी भी देवी देवता का जप किया जाये तो वे शीध्र ही प्रसन्न हो जाते हैं। रुद्राक्ष की माला रुद्राक्ष के दानों से बनाई जाती है। इसमें दानों की संख्या ज्योतिषीय दृष्टि से शुभ ली जाती है जैसे कि 108, 54, 27. इनमें से 1’ वाले दाने को सुमेरू कहा जाता है जो कि जप के समय पार नहीं किया जाता. लेकिन माला को 108, 54 या 27 रुद्राक्षों की माला ही कहा जाता है। 

एक मुखी रुद्राक्ष मुष्किल से मिलता है और बहुत शक्तिषाली होता है। 5 मुखी रुद्राक्ष की माला पूजा के काम आती है। 16 रुद्राक्ष के दानों की माला माथे पर, 26 रुद्राक्ष के दानों की माला सिर पर और 50 रुद्राक्ष के दानों की माला हृदय पर पहनी जाती है। एक ही माला जप व पहनने दोनो कामों में उपयोग नहीं की जा सकती परंतु इस विषय पर अपवाद भी मिलते हैं। कुछ संत लोग तो जप की हुई माला ही पहनना लाभदायक समझते हैं। जप करते समय माला अनामिका और मध्यमा उंगलियों के बीच में रहती है। 

केवल रुद्राक्ष की माला ही ऐसी माला होती है जिसे किसी भी प्रकार के जप के लिये उपयोग किया जा सकता है। रुद्राक्ष की माला की इतनी खूबियों के कारण ही आज यह अमेरिका, जापान, जर्मनी, इंगलैंड आदि पश्चिमी देशों में बहुत लोकप्रिय है। ग्रंथों में कहा गया है कि रुद्राक्ष की माला को मंत्रों के द्वारा शुद्ध, पवित्र और ऊर्जावान करके ही पहना जा सकता है। तब रुद्राक्ष निश्चय ही काम करता है और अगर यह शुद्धता की कसौटी पर भी खरा उतरा हो तो यह और भी अधिक शक्तिषाली और प्रभावी हो सकता है बशर्ते कि निरंतर जप और हवन से इसकी ऊर्जा और शक्ति को बढाया जाये।



रुद्राक्ष के मुखों की संख्या के अनुसार मंत्र 1 मुखी - ऊँ नमः शिiवाय् , ॐ ह्रीं नमः 2 मुखी - श्री गौरी शंकराय नमः नमः 3 मुखी -  क्लीं नमः नमः शिवाय 4 मुखी -  ह्रीं नमः 5 मुखी -  नमः शिवाय्  ह्रीं नमः 6 मुखी - स्वामी कार्तिकेयाय नमः ह्रीं हं नमः 7 मुखी -  महालक्ष्म्यै नमः हं नमः 8 मुखी - हं नमः, ऊँ गणेशाय् नमः 9 मुखी - नव दुर्गाय् नमः ह्रीं हं नमः 10 मुखी - श्री नारायणाय नमः, श्री वैष्णवाय नमः ह्रीं नमः 11 मुखी - श्री रूद्राय नमः ह्रीं हं नमः 12 मुखी - श्री सूर्याय नमः 13 मुखी -  ह्रीं नमः 14 मुखी -  नमः शिवाय उपरोक्त सभी मंत्रों के बाद महामृत्युंजय मंत्र का 9 बार जाप किया जाता है जो इस प्रकार है -  त्र्यंबकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ऊर्वारूकमिव बंधनानमृत्र्योमुक्षीय मामृतात् । 
रुद्राक्ष की उपयोगिता और लाभ..... 
1 मानसिक तनाव से मुक्ति पाने में रुद्राक्ष रामबाण की तरह से काम करता है। 2 एषिया के विभिन्न साधु व सन्यासियों के अनुसार मात्र रुद्राक्ष धारण करने से ही उन्हें तपस्या करने के लिये घ्यान केंद्रित करने में और विचारशील मन को काबू करने में अत्यन्त मदद मिलती है। 
3 रुद्राक्ष शरीर, मन और आत्मा के लाभ के लिये अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है। यह शरीर को बल प्रदान करता है और बीमारियों से लडने में मदद करता है। आयुर्वेद के अनुसार रुद्राक्ष शारीरिक सरंचना में सुधार लाता है। यह रक्त की अशुद्धियों को दूर कर शरीर को निरोगी बनाता है. 4 यह मानव शरीर के अंदर के साथ-साथ शरीर के बाहर की वायु में भी जीवाणुओं का नाश करता है। 5 यह तनाव, चिंता और डिप्रेशन का प्रभाव भी कम करता है। रुद्राक्ष सिरदर्द, खांसी, लकवा, और मातृत्व की रूकावटों को दूर करने में भी मदद करता है। 
6 मेडिकल साइंस के अनुसार भी यह सिद्ध हो गया है कि रुद्राक्ष को धारण करने से ही हृदय गति में सुधार आ जाता है तथा उच्च रक्तचाप ठीक होने लगता है। 7. वे जातक जिनको उच्च रक्त चाप की शिकायत है, उन्हें रुद्राक्ष का लाभ निम्न तरीके से लेना चाहिये - ‘‘पांच मुखी रुद्राक्ष के दो दाने रात को एक गिलास पानी में रख दें व सुबह खाली पेट उस जल को पी लें। गिलास ताम्बे  के अतिरिक्त किसी भी धातु का हो सकता है।’’ 40 दिन तक नियमित लेने से फर्क महसूस किया जा सकता है। 8 वे जातक जो हमेशा चिंता में रहते है, अथवा जिनका आत्मविष्वास खो-सा गया होता है या जो कांपते ज्यादा हैं - उन्हें रुद्राक्ष का लाभ निम्न तरीके से लेना चाहिये: ‘‘ ऐसे जातक एक पांच मुखी रुद्राक्ष हमेशा अपने पास रखें और जब जब वे जरूरत महसूस करें, उस रुद्राक्ष को अपनी दांयी हथेली में जोर से भींच लें और इस प्रकार से दस मिनट तक रहें। इससे उनका आत्मविष्वास वापिस आ जायेगा और उनका शरीर भी स्थिर हो जायेगा।’’ 
9 रुद्राक्ष को पहनने से चेहरे पर तेज आता है जो व्यक्तित्व को निखारने के काम आता है। 10 यह व्यक्ति की यादाश्त को बढाने में भी उपयोगी है। 11 रुद्राक्ष जीवन की समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करता है, सुख-शांति प्रदान कर मान-सम्मान में वृद्धि करता है। 12 रुद्राक्ष शारीरिक स्वास्थ्य के साथ साथ आत्मा की उन्नति के लिये भी लाभदायक है। रुद्राक्ष को धारण करने से पूर्वजन्म के उन पापों से मुक्ति मिलती है जो कि इस जन्म में भी रूकावटें पैदा कर सकते हैं। 13 अगर कोई व्यक्ति अपनी बुरी आदतों से छुटकारा पाना चाहता है और शुद्धता का जीवन जीना चाहता है तो उसे रुद्राक्ष की माला पहननी चाहिये, निष्चित रूप से लाभ मिलता है। 
14 रुद्राक्ष अशुभ ग्रहों के प्रभाव को भी कम करने में उपयोगी होता है। ब्रह्मांड में 27 नक्षत्र हैं जो कि 9 ग्रहों को चलाते हैं। प्रत्येक नक्षत्र किसी न किसी रुद्राक्ष से जुडा होता है जो कि संबंधित ग्रह से ऊर्जा प्राप्त करता है। यह केवल ऊर्जा प्राप्त ही नहीं करता बल्कि इसका वितरण भी करता है। यह निष्चित है कि रुद्राक्ष ग्रहों के बल से ऊंची और प्रभावशाली वस्तु है। तभी तो विभिन्न मुखी रुद्राक्ष विभिन्न ग्रहों की शांति के लिये काम में लिये जाते हैं। जो ग्रह जातक के लिये अशुभ है, उस ग्रह से संबंधित रुद्राक्ष ही धारण कर उस अशुभ ग्रह की शांति की जा सकती है। 15 प्रत्येक रुद्राक्ष किसी न किसी देवता या देवी से संबंधित होता है। यही धनात्मक बल रुद्राक्ष के धारक को नकारात्मक ऊर्जा और शत्रुओं से बचाता है। 
16 रुद्राक्ष जीवन की अति आवश्यक वस्तु है क्योंकि यह भगवान शिव से संबंधित है औरसही शिव देवों के देव महादेव हैं। अतः रुद्राक्ष पहनने वाले को अगर रुद्राक्ष से अधिक से अधिक लाभ लेना है तो उसमें श्रद्धा और विष्वास होना बहुत जरूरी है।


शुभमस्तु !!






रुद्राक्ष का चमत्कार.....2





 प्राचीन पांडुलिपि ‘‘रुद्राक्ष कल्प’’ में भी 108 मुखी रुद्राक्ष का वर्णन आता है। जन्मकुंडली देख कर ही यह निश्चय किया जाता है कि जातक को कितने मुखी रुद्राक्ष पहनना चाहिये। विभिन्न मुखी रुद्राक्षों का वर्णन इस प्रकार है
 
1 मुखी - एक मुखी रुद्राक्ष तो भगवान शंकर का ही स्वरूप माना जाता है। यह रुद्राक्ष सूर्य से संबंधित हैं और सूर्य के अशुभ प्रभाव जैसे आत्मविश्वास की कमी, निस्तेज चेहरा, दब्बूपना आदि को ठीक करता हैं और सूर्य द्वारा दिये जाने वाले रोगों को ठीक कर सकते है जैसे दायीं आंख के रोग, सिर दर्द, कान के रोग, हडिडयों की कमजोरी आदि। साथ ही समृद्धि, शक्ति व नेतृत्वक्षमता भी देता है। यह धारक को उच्च पद, आदर व सम्मान दिलवाता है। जिस घर में एक मुखी रुद्राक्ष होता है, उस घर में सदा लक्ष्मी का वास होता है,शत्रु स्वयं ही परास्त हो जाते हैं.

2 मुखी - दो मुखी रुद्राक्ष शिव-शक्ति का स्वरूप है। यह चंद्रमा से संबंधित है और चंद्रमा के अशुभ प्रभाव को कम करता है। चंद्रमा द्वारा दिये जाने वाले रोग जैसे बांयीं आंख के रोग, किडनी का रोग, आंत के रोग  को ठीक करता है। साथ ही आपसी संबंधों में आई कड़वाहट को भी दूर करता है और मानसिक शक्ति बढाता है। जो व्यक्ति गौरी शंकर रुद्राक्ष धारण नहीं कर सकते, उन्हें गौरी व शंकर दोनों को प्रसन्न करने के लिये दो मुखी रुद्राक्ष ही धारण करना चाहिये। वक्ताओं, न्यायाधीशों, वकीलों, वैज्ञानिकों, अनुसंधानकर्ताओं व विद्यार्थियों के लिये यह उतम रुद्राक्ष है।

 3 मुखी - तीन मुखी रुद्राक्ष ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का स्वरूप है। अतः इसे पहनने से त्रिदेव की प्रसन्नता मिलती है। यह मंगल से संबंधित है। मंगल द्वारा दिये जाने वाले अशुभ प्रभाव जैसे कि रक्त के रोग, उच्च रक्त चाप, षारीरिक कमजोरी, महावारी के रोग, किडनी के रोग, तनाव, नकारात्मक सोच, पापबोध आदि को ठीक करता है। दया, धर्म एवं परोपकार के विचारों को विशेष रूप से बढाता है। वात, पित्त व कफ का षरीर में उचित संतुलन रखता है। कमजोर विद्यार्थियों के लिये लाभदायक है। बार-बार बीमारियों से परेशान रहने वाले जातकों को लाभ देता है।
 
4 मुखी - यह देवी सरस्वती और ब्रह्मा का स्वरूप है। यह बुध से संबंधित है और बुध ग्रह के अशुभ प्रभावों जैसे कि दिमागी कमजोरी, कुछ भी समझने की कमी, बोल-चाल की दिक्कत, दिमाग की नसों की कमजोरी आदि से बचाता है। यह मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष देने वाला रुद्राक्ष है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैष्य व शुद्र चारों वर्गों से पूजित है। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ व सन्यासी सभी इसे धारण कर सकते हैं। वेद, पुराण, संस्कृत पढने-पढ़ाने वालों को तो यह अवश्य ही धारण करना चाहिये। 

5 मुखी - पांच मुखी रुद्राक्ष परमेश्वर का स्वरूप है। यह गुरु से संबंधित है और ज्ञान, सौंदर्य, मानसिक शान्ति, धन, संतान आदि देता है। यह गुरू के अशुभ प्रभाव जैसे कि वैवाहिक जीवन में  तनाव, मोटापा, शुगर, जांघ व किडनी के रोग को ठीक करता है। यह दीर्ध आयु व अपूर्व स्वास्थ्य प्रदान करता है। टूटे दिलों को जोडता है व अचानक हमले से रक्षा करता है। 

6 मुखी - छः मुखी रुद्राक्ष स्वामी कार्तिकेय का स्वरूप है। यह शुक्र से संबंधित है और शुक्र के अशुभ प्रभाव व रोग जैसे कि प्रजनन अंगों के रोग, उच्च रक्तचाप आदि रोगों को ठीक करता है और प्रेम व संगीत आदि में रूचि जगाता है। विद्या-अध्ययन में भी उपयोगी है। धन-संपत्ति के कष्टों से मुक्ति मिलती है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर नामक छः दुर्गुणों को दूर करता है। 

7 मुखी - सात मुखी रुद्राक्ष लक्ष्मी का स्वरूप है। यह शनि ग्रह से संबंधित हैं और शनि के अषुभ प्रभाव जैसे कि रोग, मृत्यु, नपुंसकता, सर्दी, निराशा, अंधकार आदि को दूर करता हैं। यह सप्तकोटि मंत्रों के समतुल्य है। सप्तावरण का मोह भंग करवाता है। यह रुद्राक्ष धारण करने से सप्त द्वीप दर्शन की इच्छा होने पर यात्रा सुगम होती है। सात मुखी रुद्राक्ष से व्यापार व नौकरी में उन्नति मिलती है तथा धन-धान्य की कमी नहीं रहती। 
  
8 मुखी - आठ मुखी रुद्राक्ष गणेश जी व रूद्र का स्वरूप है। यह राहु ग्रह से संबंधित है और राहु के अशुभ प्रभावों जैसे कि फेंफड़ों के रोग, अकस्मात् होने वाली घटनायें, मोतियाबिंद, पैर, त्वचा के रोग आदि को ठीक करता है। लेखन-कला में निपुणता देता है। व्यक्ति को अंतर्मुखी होने की षक्ति देता है। 

9 मुखी - नौ मुखी रुद्राक्ष मां दुर्गा का स्वरूप है। अतः नवरात्री व्रतों का फलदाता है। नवग्रहों में से अनिष्टकारक का नाश करता है। ये केतु ग्रह से संबंधित है और केतु के अशुभ प्रभावों जैसे कि फेफड़ों के रोग, ज्वर, आंख का दर्द, त्वचा रोग, शरीर दर्द आदि को ठीक करता है व आत्मबल की वृद्धि करता है। दिल की धडकन, चलने से घबराहट पैदा होना, श्वास फूलना, हाफना आदि रोगों में लाभकारी होता है। गृहस्थी की समस्याओं को दूर करता है। 

10 मुखी - दस मुखी रुद्राक्ष विष्णु का स्वरूप है। यह सभी ग्रहों के अशुभ प्रभाव को कम करने में सक्षम है तथा जातक को एक संपूर्ण सुरक्षा का अहसास देता है। इसे प्रमुख दस अवतारों का आशीर्वाद प्राप्त है। दस इन्द्रियों द्वारा किये गये पापकर्मों का नाष करता है। राजसी कार्यों में सफलता मिलती है। दस दिशाओं में यश की वृद्धि करता है। हृदय व दिमाग को मजबूत करता है। अपरिचित व्यक्ति भी मित्र बनने लगते हैं। 

11 मुखी - ग्यारह मुखी रुद्राक्ष ग्यारहवें रूद्र का स्वरूप है। ग्यारहवें रूद्र महावीर बजरंगबली हैं। यह जातक को साहस व आत्मविश्वास देता है और जातक हिम्मत व बहादुरी से जीवन जीता है। विद्यावान, गुणी और चतुर भी बनाता है। जातक में दूसरों के मन की बात जान लेने का गुण आने लगता है। झुंझलाहट व अधीरता से मुक्ति दिलवाता है। गमगीन स्वभाव को दूर करता है। यह किसी से पूछे बिना भी धारण किया जा सकता है। 

12 मुखी - बारह मुखी रुद्राक्ष सूर्य देव का स्वरूप है। यह सूर्य ग्रह से संबंधित है। बारह मुखी रुद्राक्ष धारण करने से राजकीय कामों में सफलता मिलती है। महत्त्वाकांक्षायें ऊंची होने लगती है। यह आपसी कलह भी शांत करता है। 

13 मुखी - तेरह मुखी रुद्राक्ष इन्द्र का स्वरूप है। यह 6 मुखी रुद्राक्ष की तरह से ही काम करता है और सांसारिक सुखों की पूर्ति भी करता है। राज्य में पद प्राप्त करवाता है। उदार व सात्विक भाव उत्पन्न होते हैं। नवीन योजनाओं को सफल करने के लिये यह लाभदायक है। 

14 मुखी - चैदह मुखी रुद्राक्ष भगवान शिव त्रिपुरारी का स्वरूप माना जाता है। यह शनि ग्रह से संबंधित है। यह सभी अभिलाषायें पूर्ण करता है और मन ईश्वर  में लगाता है। मस्तिष्क की शान्ति देने वाला है, हृदय को मजबूत करता है, उच्च रक्तताप को ठीक करता है, तपेदिक दमा कैंसर जैसे रोगों में लाभदायक है। इसे पानी में घिसकर पीने से अनेक रोगों का निवारण होता है। 

गौरी शंकर रुद्राक्ष यह सर्वश्रेष्ठ रुद्राक्ष है। दो रुद्राक्ष आपस में जुड कर यह रुद्राक्ष बनाते हैं। यह शारीरिक व मानसिक शक्ति  प्रदान करता है। यह शिव के अर्धनारीश्वर रूप का प्रतीक है। यह एक मुखी व 14 मुखी दोनो रुद्राक्षों का भी फल देने वाला होता है। इसे धारण करने से दुख-दरिद्रता पास नहीं आती। मान-सम्मान में वृद्धि होती है। वातावरण षुद्ध व पवित्र बनता है।सर्दी, निराषा, अंधकार आदि को दूर करता हैं। यह सप्तकोटि मंत्रों के समतुल्य है। सप्तावरण का मोह भंग करवाता है। यह रुद्राक्ष धारण करने से सप्त द्वीप दर्शन की इच्छा होने पर यात्रा सुगम होती है। सात मुखी रुद्राक्ष से व्यापार व नौकरी में उन्नति मिलती है तथा धन-धान्य की कमी नहीं रहती। 

शेष अगले भाग में......



शुभमस्तु !!!

रुद्राक्ष का चमत्कार.....1




रुद्राक्ष का परिचय रुद्राक्ष वह अद्भुत वस्तु है जिसे करूणा के सागर, संसार को विष की ज्वाला से बचाने वाले, उत्पत्ति-पालन-विनाश के कर्ता  भगवान शिव स्वयं धारण करते हैं। रुद्राक्ष का अर्थ है - रूद्र का अक्ष अर्थात शिव के आंसू. अर्थात रुद्राक्ष शिव स्वरूप ही है। रुद्राक्ष मानव के लिये अपने अंतर्मन में गहराईयों तक जाने का स्रोत है। इसे पृथ्वी व स्वर्ग के बीच का सेतु माना जाता है। भारत के प्राचीन ग्रंथों व पुराणों में रुद्राक्ष का वर्णन बखूबी मिलता है जैसे कि शिवमहापुराण, निर्णयसिंधु, लिंगपुराण, पद्मपुराण, मंत्रमहार्णव, महाकाल संहिता, रुद्राक्षजाबालोपनिषद, वृहज्जाबालोपनिषद्, और सर्वोल्लासतंत्र में रुद्राक्ष के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है।

एक समय भारतवर्ष में रुद्राक्ष का बहुत प्रचलन था। सभी छोटे-बड़े व्यक्ति रुद्राक्ष की माला अवश्य पहनते थे। परंतु अंग्रेजों के आने के बाद रुद्राक्ष का महत्त्व कम हो गया क्योंकि अंग्रेज लोग रुद्राक्ष पहनने वाले लोगों को असभ्य व जंगली कहते थे। धीरे धीरे लोग भी रुद्राक्ष के गुणों को भूल कर इसका प्रयोग कम करने लगे। 
रुद्राक्ष दरअसल भूरे रंग के दाने होते हैं जो कि रुद्राक्ष नामक फल के बीज होते हैं। यह फल रुद्राक्ष के पेड़ पर लगता है। जीव विज्ञान में रुद्राक्ष के पेड को ‘‘उतरासम बीड ट्री’’ कहा जाता है। इसके पत्ते हरे रंग के होते हैं। फल भूरे रंग का और स्वाद कसैला होता है। रुद्राक्ष वृक्ष अधिकतर इंडोनेशीया, नेपाल, भारत, जावा, सुमात्रा, बाली और ईरान, में पाये जाते हैं। एक अनुमान के अनुसार लगभग 65 प्रतिशत रुद्राक्ष वृक्ष इंडोनेषिया में, 25 प्रतिशत नेपाल में और प्रतिशत भारत में पाये जाते हैं।
  
ये रत्नों की तरह से हानि नहीं पंहुचाते क्योंकि रुद्राक्ष कभी भी ऋणात्मक ऊर्जा उत्सर्जित नहीं करते। रत्नों को तो किसी सुयोग्य ज्योतिषी से ही सलाह लेकर पहना जा सकता है क्योंकि गलत रत्न पहनने से लाभ की जगह हानि भी हो सकती है जबकि आमतौर पर रुद्राक्ष को कोई भी व्यक्ति कभी भी धारण कर सकता है। किसी भी रत्न की माला से रुद्राक्ष माला अधिक पवित्र, शुभ  व शक्तिषाली होती है। रुद्राक्ष की कार्यप्रणाली प्रत्येक इंसान की अपनी अपनी ‘‘ओरा’’ (ऊर्जा क्षेत्र) होती है जो उसके शरीर के चारो ओर 2 से 4 इंच तक की परिधि में रहती है। यह इंसान की आत्मिक ऊर्जा को दर्षाती है। यह अपने अंदर इंद्रधनुष के सभी रंग समेटे होती है। यही ऊर्जा व रंग ही इंसान के स्वभाव, गरिमा, मानसिक स्थिति, भावनाओं, इच्छाओं आदि के बारे में संकेत देते हैं। यह ओरा अंगुठे की छाप की तरह होती है जो कि प्रत्येक इंसान की अपनी अलग होती है और यह बताती है कि इंसान अपने आप में पूर्ण रूप से क्या है। यह माना जाता है और अब तो सिद्ध भी हो गया है कि रुद्राक्ष की अपनी कुछ खास चुंबकीय और विद्युतीय तरंगें होती हैं। जब कोई व्यक्ति रुद्राक्ष को दिल के पास पहनता है तो उसमें से कुछ विशेष  रश्मिया  या किरणें निकलती हैं जिनकी गुणवत्ता रुद्राक्ष के मुखों के अनुसार होती हैं। ये किरणें ही उस व्यक्ति के दिमाग के तंतुओं और कोषिकाओं को प्रभावित कर उसकी ओरा को पवित्र और शुद्ध रखने में मदद करती हैं। मेडिकल सांइस में भी यह बात सिद्ध हो चुकी है.

रुद्राक्ष को किसी धातु विषेष जैसे कि सोने, चांदी या ताम्बे  के साथ भी पहना जा सकता है जो कि रुद्राक्ष की चुंबकीय व विद्युतीय गुणों को और अधिक बढा सकते हैं। गुणवत्ता की जांच रुद्राक्ष के पानी में डूबने या तैरने की विधि भी प्रामाणिक जांच नहीं है। सबसे अच्छा जांच का तरीका तो अनुभव ही है और कौशिश करें कि वहां से लें जहां पर भरोसा हो। एक अन्य तरीका है कि रुद्राक्ष को यदि यह असली रुद्राक्ष है तो इसका कुछ भी नहीं बिगडेगा और यदि यह नकली रुद्राक्ष है तो इसमें दरारें पड़ जायेंगी, इसका रंग उतर जायेगा, इसका आकार बदल जायेगा या यह बदबू देने लगेगा। रुद्राक्ष से संबंधित कुछ सावधानियां रुद्राक्ष सामान्य रूप से किसी भी व्यक्ति को स्वास्थ्य, शान्ति  व समृद्धि देता है. हालांकि रुद्राक्ष की शक्ति किसी भी रत्न, यंत्र, तंत्र या मंत्र से अधिक है फिर भी रुद्राक्ष धारक को रुद्राक्ष की शक्ति और पवित्रता बनाये रखने के लिये कुछ नियम मानने चाहियें जो कि इस प्रकार हैं: रुद्राक्ष को किसी शुभ  मुहुर्त में सोमवार या गुरूवार को पहनना चाहिये  रुद्राक्ष को धारण करने से पहले दूध, घी, तेल आदि से धोकर साफ व शुद्ध करना चाहिये। तत्पष्चात् रुद्राक्ष के मुख संख्या के अनुसार मंत्रों से जाप कर रुद्राक्ष को ऊर्जा देनी चाहिये व कार्यशील बनाना चाहिये। रोजाना सुबह नहाने के पश्चात् पूर्व दिशा की ओर मुख कर रुद्राक्ष मंत्रों का 9 बार जाप करके और रुद्राक्ष को घूप-दीप दिखाकर पहनना चाहिये। यही प्रक्रिया सोने से पहले भी दोहरानी चाहिये और सोने से पहले रुद्राक्ष को उतार कर पूजा स्थल पर रख देना चाहिये। रुद्राक्ष धारक को मांसाहारी भोजन व मदिरा सेवन नहीं करना चाहिये। उसे हमेशा सच बोलना चाहिये व रोजाना भगवान शिव के मंदिर में उनके आशीर्वाद के लिये जाना चाहिये। अशुभ स्थानों जैसे कि शमशान आदि पर रुद्राक्ष को नहीं ले जाना चाहिये। 

रुद्राक्ष को उस स्थान पर भी नहीं ले जाना चाहिये जहां किसी बच्चे ने जन्म लिया हो। स्नान व शौचालय के समय भी रुद्राक्ष को धारण नहीं करना चाहिये। साबुन रुद्राक्ष के गुणों को प्रभावित करता है। स्त्री प्रसंग के समय भी रुद्राक्ष को उतार देना चाहिये। यदि रुद्राक्ष धारक स्त्री है तो उसे अपने महावारी के दिनों में रुद्राक्ष को उतार देना चाहिये। रुद्राक्ष को हमेशा साफ रखना चाहिये। धूल और मिटटी रुद्राक्ष के दानों के छिद्रों में जमा हो सकती है। उसे तुरंत किसी ब्रश आदि से साफ कर देना चाहिये। तत्पश्चात गंगाजल से धो लेना चाहिये। रुद्राक्ष को तेल से भी धोना चाहिये और धूप आदि भी दिखाना चाहिये, विषेषकर उन दिनों में जब रुद्राक्ष कुछ समय के लिये प्रयोग में नहीं लिया जा रहा है। जो लोग त्वचा रोग के कारण किसी तरह की माला आदि नहीं पहन सकते, उन्हें रुद्राक्ष को पूजा स्थल पर रख कर पूजा-नमस्कार आदि करना चाहिये। रुद्राक्ष माला किसी अन्य व्यक्ति से बदलनी नहीं चाहिये। रुद्राक्ष पहनने के 40 दिन के बाद व्यक्ति को अपने अंदर व अपने व्यवहार में बदलाव महसूस होने लगता है। विभिन्न प्रकार के रुद्राक्ष एवं उनके लाभ विभिन्न प्रकार के रुद्राक्ष उनकी ‘‘मुख संख्या’’ के अनुसार जाने जाते हैं। रुद्राक्ष के दानों यानि मनकों पर कुछ धारियां सी होती हैं जिन्हें ‘‘मुख’’ कहा जाता है. इन्हीं मुखों के सहारे ही रुद्राक्ष की गुणवत्ता भी जांची जाती है। इन्हीं धारियों या मुखों के अनुसार ही रुद्राक्ष एक मुखी से बहुमुखी कहे जाते हैं। 

शास्त्रों में 1 से 32 मुखी तक के रुद्राक्ष की बात की गई है लेकिन ज्योतिषीय दृष्टि से 1 से 14 मुखी तक के रुद्राक्ष ही उपयोग में लाये जाते हैं। 32 मुखी तक के रुद्राक्ष आसानी से मिलते भी नहीं हैं। केवल 14 मुखी तक के रुद्राक्ष ही आसानी से मिल पाते हैं. कभी कभी 16 या 18 मुखी रुद्राक्ष भी उपलब्ध हो जाता है। 


शेष अगले भाग में......




शुभमस्तु !!

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