जय श्री कृष्णः.श्री कृष्ण शरणं मम.श्री कृष्ण शरणं मम.चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः। स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत । तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥ जय श्री कृष्णः

बुधवार, 20 अप्रैल 2016

मिथुन लग्न तथा शुभ अशुभ विचार.................

ज्योतिष शास्त्र में मनुष्य के जीवन की समस्त घटनाओं को जान्ने के लिए हमारे ऋषि मिनियों ने तप और साधना कर जन्म कुंडली का साधन दिया उस जन्म कुंडली में नौ ग्रह, बारह राशियाँ तथा सत्ताईस नक्षत्रों का वर्णन किया इन सबके आपस में जो योग बनते है और दशाओं का ज्ञान से मनुष्य अपने भविष्य में शुभ अशुभ देखने की कौशिश करता है.

उसी अन्तरिक्ष विज्ञान के अनुसार हमारा अन्तरिक्ष 12 भागों में विभाजित कर प्रत्येक भाग को 30 डिग्री का मान कर उसमें नक्षतों का मान निश्चित किया तथा उन 12 भागों को अलग अलग नाम से प्रतिष्ठित किया गया,


आज हम दुसरे भाग के बारें में चर्चा करेंगे जिसे "मिथुन राशि " नाम से जानते है.वैदिक ज्योतिष में प्रत्येक राशि का अलग अलग महत्व है, वृष राशि का विस्तार 60 से 90 अंश का होता है, मिथुन  राशि का स्वामी बुध ग्रह है, 

यह राशि स्वभाव से द्वि-स्वभाव राशि की श्रेणी में आती है अर्थात इसमें चर व स्थिर राशि दोनो के ही गुण विद्यमान होते हैं.

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