जय श्री कृष्णः.श्री कृष्ण शरणं मम.श्री कृष्ण शरणं मम.चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः। स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत । तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥ जय श्री कृष्णः

शनिवार, 21 मई 2016

आभूषणों (ornaments) द्वारा लाभ प्राप्त करें...............

भारतीय ज्योतिष में ग्रहों और धातुओं का सीधा घनिष्ठ संबंध माना गया है.क्योंकि जितने भी ज्योतिष के रत्नों द्वारा उपाय है उस सभी रत्नों में कोई ना कोई धातु का प्रयोग अवश्य होता है, साथ ही धातु आयुर्वेद ओर अन्य उपचार ओर जीवन प्रणाली का भी अभिन्न अंग है, ग्रहों की तरह धातुओं की भी अपनी एक प्रकृति तथा अलग स्वभाव होता है कि किस धातु के क्या गुण धर्म है.

इसी धातु और रत्नों के रहस्य को जान कर प्राचीन काल में राजा-महाराजा धातु लाभ लेने के लिए लोहे,तांबे के अदि के बर्तनों में खाना बनवाते थे, तथा  सोने व चांदी के बर्तनों में खाना खाते थे. जिस से उनके शरीर मे धातु तत्व पहुंचते रहें और ग्रह उनके अनुकूल रहें. प्रत्येक धातु से एक विशेष धारा ऊर्जा ओर तरंगे प्रवाहित होती है.


भारतीय ज्योतिष अनुसार प्रत्येक ग्रह किसी ना किसी धातु से सम्बन्ध रखता है या उसका प्रतिनिधित्व करता देखा गया है. स्वर्ण के आभूषणों की तासीर गर्म और चांदी की शीतल है, सूर्य-सोने और तांबे पर, शुक्र व चंद्रमा-चांदी, मंगल-तांबे, गुरु-सोने और शनि व राहू-लोहे पर आधिपत्य रखते हैं.


ज्योतिष में सूर्य-ह्रदय, मुंह, गला व सिर का, चंद्रमा-वक्ष, पेट, मंगल-भुजा और शनि-पैरों का प्रतिनिधित्व करता है. कह सकते हैं कि आभूषण ओर पत्र के उपयोग से भी ग्रहों को अनुकूल बनाने में खासी भूमिका निभा सकते हैंआभूषण रत्न जडि़त हो तो ग्रह पीड़ा, नजर और दु:स्वप्न का नाश होता है.


जो महिलाएं केवल स्वर्णाभूषण पहनती हैं, उनमें गर्म धारा अधिक होती हैवे स्थाई रूप से रोगिणी हो सकती हैं. केवल सोना पहनने से पित्त की अधिकता होगी.ग्रहों के अनुसार कहां-कौन सी धातु का आभूषण रहेगा उचित होगा..

ज्योतिष में पैर-शनि का और सूर्य-सिर का प्रतीक है और ये परस्पर शत्रु माने जाते हैं. आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य का सिर ठंडा और पैर गर्म रहने चाहिए. इसलिए सिर पर सोना और पैरों में चांदी के आभूषण ही धारण करने चाहिए. प्राचीन काल में राजा भी शायद इसी कारण से सुवर्ण मुकुट धरण किया करते थे. इससे सिर से उत्पन्न ऊर्जा पैरों में और चांदी से उत्पन्न ठंडक सिर में जाएगी. इससे सिर ठंडा व पैर गर्म रहेंगे. सिर में चांदी के व पैरों में सोने के आभूषण नहीं पहनने चाहिए. इससे स्त्रियां अवसाद, पागलपन या अन्य रोगों की शिकार बन सकती हैं.

पैरों में कभी भी भूल कर सोने की पायल नहीं पहननी चाहिए, चांदी की पायल पहनने से पीठ, एड़ी व घुटनों के दर्द, रक्तशुद्धि, मूत्ररोग, हिस्टीरिया आदि रोगों से राहत मिलती हैसिर और पांव दोनों में स्वर्णाभूषण पहनने से मस्तिष्क और पैरों में समान गर्म ऊर्जा प्रवाहित होगी, जिससे पुरुष या महिला रोगग्रस्त हो सकता/सकती है. यही नहीं आभूषणों में अन्य धातु के टांके से भी धारा गड़बड़ा जाती है लेकिन टांके में अन्य धातु का मेल आवश्यक है लेकिन इसमें जिस धातु का गहना है, उसका मिश्रण अधिक हो तो रोग रहित होंगे.
ऊर्जा प्रवाह की गड़बड़ में परिणाम विपरीत होता है. यदि सोने में चांदी की मिलावट हो तो गर्म व ठंडे का मिश्रण से अन्य प्रकार की धारा बन सकती है.
अत: सोने के पतरे का खोल बनवा कर भीतर चांदी, या जस्ते की धातुएं भरवा कर कड़े, हंसली आदि आभूषण से रोग पैदा होते हैं. ऊर्जा का प्रवाह हमेशा किनारों से प्रवेश होता है. अत: मस्तिष्क के दोनों भागों को ऊर्जा प्रभाव से प्रभावशाली बनाने के लिए नाक और कान में सोना पहनना चाहिए.
यश, सम्मान देती है तांबे की धातु....जिन्हें समय पर यशमान-सम्मान नहीं मिले या ह्रदय संबंधी रोग होंऐसे जातकों को अनामिका में सोने या तांबे की धातु धारण करनी चाहिए.
ज्योतिष के अनुसार गुरु कान और सोने का प्रतिनिधित्व करता है. अत: सोने की बालियां या झुमके पहनने से स्त्रियों में स्त्री रोग, मासिक धर्म संबंधी अनियमितता, कान के रोग, हिस्टीरिया, डिप्रेशन में लाभ होता है. जो लोग स्वयं को अन्य लोगों से कमतर या कमजोर महसूस करते हों या फिर उनमें हीन भावना घर कर चुकी हो, ऐसे में उन्हें तर्जनी उंगली में सोने का आभूषण धारण करना चाहिए. ज्योतिष में गुरु को नेतृत्व क्षमता कारक ग्रह माना गया है और इनकी धातु भी सोना है. ऐसी स्थिति में स्वर्ण उन्हें अनुकूल परिणाम देता है.
शनि को शुष्क और महीन ग्रह कहा गया है. ऐसे में जो कोई भी मध्यमा अंगुली में लोहे या काले घोड़े की नाल की अंगूठी पहनता है तो ऐसे जातक को रोग, नजर, तांत्रिक अभिकर्म में लाभ मिलता है. जिनका मोटापा अधिक है या वजन बढ़ रहा हो ऐसे जातकों को मध्यमा में रांगे की अंगूठी धारण करनी चाहिए. ज्योतिष में शनि मध्यमा, काला रंग व लोहे का कारक है. जिन जातकों के हाथ-पैरों में दर्द रहता है, वे हाथ में सोने या चांदी का कड़ा धारण करें इससे लाभ होगा. जो जातक निम्न रक्तचाप से परेशान रहते हों, उन्हें भुजा पर तांबे का कड़ा धारण करना चाहिए.
रोग निवारण में धातु की भूमिका...
खास धातु के बनाए आभूषण रोग निवारण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. जिन को कमर या पेट के रोग हों, वे कमर में सोने, तांबे या चांदी की कनकती धारण करें, लाभ मिलता है. धातु ग्रह-क्लेश को भी नियंत्रित कर सकता है. जो कि दाम्पत्य कलह के शिकार हों, उन्हें चांदी की चेन या अंगूठी धारण करनी चाहिए. साथ ही जो व्यक्ति मानसिक अशांति के कारण अवसाद में हों वे चांदी, तांबा, स्वर्ण धातु से निर्मित छल्ला पहनें तो लाभ मिलेगा.
यदि चंद्र से पीडि़त है या मानसिक कष्ट, कफ, फेफड़े का रोग, तन से परेशान हो तो नाक में चांदी का छल्ला डालना लाभ देता है.
बच्चों को टोटकों से बचाने या दांत आसानी से निकलने के लिए हाथ-पैर में लोहे या तांबे का छल्ला, गले में चंद्र्रमा या सूरज बना कर पहनाने चाहिएं. 
जो व्यक्ति मूत्र रोग से पीडि़त हों वे रेशम का सफेद धागा या चांदी का कड़ा बाएं पैर के अंगूठे में बांधें तो लाभ मिलेगा. 

जिन स्त्रियों के स्नायु तंत्र, गला व कंठ संबंधी रोग हो, वे हाथ के अंगूठे में छल्ला पहनें तो शीघ्र लाभ मिलने लगता है. ज्योतिष में इस भाग से तर्क व इच्छा शक्ति देखी जाती है.
आभूषण धारण करने का रहस्य.....
विश्व के पहले शल्य चिकित्सक सुश्रुत के अनुसार यदि कानों में छिद्र करके सोने या जस्ते की बालियां पहन ली जाय तो आंत उतरने, पसली का रोग लगने की संभावना नहीं रहती.
हंसुली को गले में पहनने से नेत्र ज्योति बनी रहती है. इससे गलगण्ड रोग भी नहीं होता अंगूठी धारण करने से मानसिक तनाव कम हो जाता है.यह सब आभूषणों का ही चमत्कार है.
आभूषणों का प्रयोग आदिकाल से पूरे संसार में होता आ रहा है मनुष्य के सभ्य बनने के साथ यद्यपि आभूषणों का रंग रूप आकार बदलते रहे लेकिन उनकी अनिवार्यता सदैव विध्यमान हे ओर रहेगी....
अब फेशन के साथ साथ शास्त्रों में दी गयी अमूल्य बात को भी समझ कर उचित धातु का प्रयोग कर लाभ उठायें.... 



शुभमस्तु !!



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